नई दिल्ली। से खरमास की शुरुआत हो रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह अवधि संयम, साधना और आत्मिक उन्नति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस दौरान विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन संस्कार और नए व्यवसाय की शुरुआत जैसे मांगलिक कार्यों से परहेज करने की परंपरा है, जबकि पूजा पाठ, दान पुण्य और तीर्थ यात्रा जैसे धार्मिक कार्य विशेष शुभ फल प्रदान करते हैं।
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ज्योतिष शास्त्र के अनुसार खरमास के समय सूर्य देव धनु या मीन राशि में प्रवेश करते हैं। इस अवस्था में सूर्य की ऊर्जा अपेक्षाकृत कमजोर मानी जाती है। सूर्य देव को नवग्रहों का राजा और आत्मा का कारक माना गया है, इसलिए उनकी पूर्ण शक्ति के अभाव में किए गए मांगलिक कार्यों से अपेक्षित फल नहीं मिल पाता। साथ ही, इस अवधि में गुरु ग्रह बृहस्पति भी अपनी संपूर्ण शुभ शक्ति प्रदान नहीं कर पाते, जिससे शुभ कार्यों का प्रभाव अधूरा रह सकता है।
इसी कारण धार्मिक मान्यताओं में खरमास के दौरान विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन संस्कार या नए व्यापार की शुरुआत को टालना ही श्रेयस्कर बताया गया है। यह समय बाहरी गतिविधियों की बजाय धैर्य, साधना और आत्मचिंतन पर केंद्रित रहने का होता है।
धर्मग्रंथों के अनुसार, खरमास में किए गए पूजा पाठ, जप तप और दान पुण्य से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इससे मानसिक शांति प्राप्त होती है और भविष्य में किए जाने वाले मांगलिक कार्यों के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनती हैं।
खरमास में क्या करना माना जाता है शुभ
खरमास की अवधि में भगवान विष्णु, भगवान शिव या अपने इष्ट देव की नियमित पूजा, भजन और कीर्तन करने से मन शांत रहता है और पारिवारिक जीवन में संतुलन बना रहता है। जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और आवश्यक वस्तुओं का दान करना पुण्यदायी माना गया है। इस समय तीर्थ यात्रा और धार्मिक स्थलों के दर्शन से आध्यात्मिक लाभ मिलता है। घर और पूजा स्थल की स्वच्छता, दीपक जलाना और सकारात्मक वातावरण बनाए रखना सुख समृद्धि और स्वास्थ्य को बढ़ावा देता है। ध्यान, जप और आत्मनिरीक्षण से मानसिक स्थिरता बढ़ती है और जीवन से जुड़े निर्णय लेने की क्षमता मजबूत होती है।
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कुल मिलाकर, खरमास को ठहराव और साधना का काल माना गया है। इस अवधि में संयम, श्रद्धा और धार्मिक आचरण अपनाने से जीवन में संतुलन, शांति और सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव होता है।
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