रायपुर। छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में इन दिनों ब्लैकबोर्ड सूने पड़े हैं और क्लासरूम में सन्नाटा है। वजह कोई हड़ताल नहीं, बल्कि शिक्षा विभाग का वो डिजिटल फरमान है जिसने शिक्षकों के हाथों से चाक और डस्टर छीनकर उन्हें मोबाइल स्क्रीन का गुलाम बना दिया है। शालेय शिक्षक संघ का दर्द अब आक्रोश में बदल चुका है। ईटीवी भारत के वरिष्ठ संवाददाता प्रवीण कुमार सिंह के साथ बातचीत में प्रदेश अध्यक्ष वीरेंद्र दुबे और पदाधिकारी कृष्णा राज पांडे ने विभाग की अव्यावहारिक नीतियों को सामने रखा है।
पढ़ाई पर भारी डिजिटल महामारी: 25 ऐप्स के फेर में फंसा बचपन
सर्व शिक्षक संघ ने सीधे तौर पर इसे शिक्षा व्यवस्था का नुकसान होना बताया है। सरकार ने शिक्षकों के कंधों पर वीएसके, दीक्षा, उल्लास और टीबीसी जैसे 25 से ज्यादा ऐप्स का बोझ लाद दिया है। वीरेंद्र दुबे का कहना है कि एक ही छात्र की जानकारी को पांच अलग-अलग ऐप्स पर दर्ज करना पड़ता है। विभाग को यह समझना होगा कि डेटा की एंट्री से आंकड़े सुधर सकते हैं, बच्चों का भविष्य नहीं।
सर्वर डाउन, हाजिरी गायब और सीधे वेतन काटने का तुगलकी फरमान
शिक्षकों ने बताया कि वीएसके ऐप का सर्वर इतना धीमा रहता है कि स्कूल पहुंचने के बाद आधे घंटे तक शिक्षक सिर्फ ऑनलाइन हाजिरी के लिए नेटवर्क से लड़ता रहता है। यही नाटक छुट्टी के वक्त भी होता है। सबसे बड़ा अन्याय यह है कि अगर सर्वर या नेटवर्क की खराबी के कारण ऐप नहीं चला, तो सीधे शिक्षकों का वेतन काटने की धमकी दी जा रही है।
बस्तर सरगुजा में न नेटवर्क, न बिजली फिर भी ऑनलाइन हाजिरी
शिक्षकों ने जमीनी हकीकत बयां करते हुए कहा कि बस्तर, सरगुजा, जशपुर और कोरिया के दूरस्थ अंचलों में मोबाइल नेटवर्क का नामोनिशान नहीं है। कई गांवों में बिजली तक नहीं है कि मोबाइल चार्ज हो सके। ऐसे में पहाड़ों और जंगलों में बैठकर ऑनलाइन हाजिरी और डेटा फीडिंग की उम्मीद करना पूरी तरह से अव्यावहारिक है।
जेब खाली, मोबाइल भारी: शिक्षक के खर्च पर चल रहा सरकारी दफ्तर
सरकार डिजिटल व्यवस्था का ढिंढोरा तो पीट रही है, लेकिन संसाधन के नाम पर कुछ नहीं है। भारी-भरकम सरकारी ऐप्स को चलाने के लिए शिक्षकों को अपनी जेब से नया एंड्रॉयड फोन खरीदना पड़ रहा है। हर महीने का महंगा इंटरनेट रिचार्ज भी शिक्षक अपनी गाढ़ी कमाई से करवा रहे हैं, जिसका कोई सरकारी भुगतान नहीं मिलता।
किताबें गायब, पर ऐप में डिजिटल हिसाब देने का मानसिक तनाव
टीबीसी ऐप की विसंगति बताते हुए सर्व शिक्षक संघ ने कहा कि स्कूलों में कई विषयों की किताबें आज तक नहीं पहुंची हैं, लेकिन विभाग का दबाव है कि किताबों को स्कैन करके वितरण का डेटा तुरंत अपलोड करो। जब किताबें ही नहीं हैं, तो शिक्षक क्या स्कैन करें?
सिस्टम की नाकामी का ठीकरा प्राचार्यों के सिर क्यों
खराब परीक्षा परिणाम आने पर प्राचार्यों का वेतन रोकने के आदेश पर “शालेय शिक्षक संघ” ने आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि सरकारी स्कूलों में हर कमजोर और पिछड़े बच्चे को प्रवेश दिया जाता है। जब आप सालभर शिक्षक को पढ़ाने ही नहीं देंगे, तो रिजल्ट कैसे अच्छा आएगा? अपनी नाकामी छुपाने के लिए प्राचार्यों को जिम्मेदार ठहराना बंद होना चाहिए।
शिक्षक संघ की दोटूक मांग: सुधारो व्यवस्था, वरना रुकेगा काम
शिक्षक संघ ने साफ कर दिया है कि वे आधुनिक तकनीक के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि वे विभाग की अधूरी तैयारियों और तानाशाही रवैये के खिलाफ हैं। उन्होंने सरकार के सामने तीन मुख्य मांगें रखी हैं:
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वन नेशन, वन ऐप: 25 अलग-अलग ऐप्स का झंझट खत्म कर सभी कामों के लिए केवल एक ही ऐप बनाया जाए।
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सरकारी संसाधन: शिक्षकों के निजी मोबाइल का इस्तेमाल बंद हो; सरकार हर स्कूल में टैबलेट या बायोमेट्रिक मशीन खुद दे।
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पहले इंफ्रास्ट्रक्चर: वनांचल के स्कूलों में पहले बिजली और इंटरनेट की सुविधा दी जाए, उसके बाद ही ऑनलाइन काम अनिवार्य हो।
अब सीधे आंदोलन के मूड में गुरुजी
शिक्षकों ने साफ लफ्जों में चेतावनी दी है कि वे बच्चों को पढ़ाने के लिए तैयार हैं, लेकिन विभाग उन्हें जबरन क्लर्क और डेटा ऑपरेटर बना रहा है। यदि इन समस्याओं का तुरंत निराकरण नहीं किया गया, तो प्रदेश के सभी शिक्षक संगठन एक मंच पर आकर बड़े आंदोलन का बिगुल फूंक देंगे।
अब देखना यह है कि शिक्षा विभाग कागजी आंकड़ों की बाजीगरी में उलझा रहता है या छत्तीसगढ़ के बच्चों की वास्तविक पढ़ाई की चिंता करता है।

