नई दिल्ली/रायपुर | 29 मार्च 2026
भारत को नक्सलवाद के दंश से पूरी तरह मुक्त करने के लिए केंद्र सरकार का ‘मिशन 31 मार्च’ अपने निर्णायक मोड़ पर है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा घोषित समयसीमा समाप्त होने में अब महज 72 घंटे शेष हैं। खुफिया इनपुट के अनुसार, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और तेलंगाना के घने जंगलों में अब केवल 100 से 150 नक्सली ही बचे हैं। इन बचे-खुचे नक्सलियों को बाहर निकालने या आत्मसमर्पण के लिए मजबूर करने के लिए अगले 48 घंटों में एक विशाल सर्च ऑपरेशन शुरू किया गया है, जिसमें केंद्रीय सुरक्षा बलों और राज्यों की पुलिस के लगभग 50 हजार जवान शामिल हैं।
कोबरा कमांडो: जंगल युद्ध के ‘अजेय’ योद्धा
इस अंतिम प्रहार में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका कोबरा (COBRA – Commando Battalion for Resolute Action) बटालियन की है। इन कमांडोज को अमेरिकी मरीन कमांडो (US Marines) की तर्ज पर प्रशिक्षित किया गया है। कोबरा कमांडो बिना किसी बाहरी मदद के घने जंगलों में लगातार तीन रातों तक युद्ध लड़ने की क्षमता रखते हैं। साल 2015 में पहली बार गणतंत्र दिवस परेड में दुनिया के सामने आए ये जांबाज अब नक्सलियों के अंतिम गढ़ों को ध्वस्त करने के लिए तैयार हैं। उनकी छापामार युद्ध नीति और आधुनिक हथियारों के सामने नक्सली अब बैकफुट पर हैं।
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चार राज्यों में सिमटा नक्सलवाद
सुरक्षा एजेंसियों के सूत्रों के मुताबिक, नक्सलियों के शीर्ष नेतृत्व के मारे जाने या आत्मसमर्पण करने के बाद अब संगठन पूरी तरह बिखर चुका है। बचे हुए नक्सली अब किसी बड़े हमले की स्थिति में नहीं हैं, हालांकि वे आईईडी (IED) विस्फोटों के जरिए सुरक्षा बलों को नुकसान पहुँचाने की कोशिश कर सकते हैं। इसी खतरे को देखते हुए सर्च ऑपरेशन में लगे जवान बेहद सावधानी बरत रहे हैं। जवानों द्वारा पूर्व में नक्सल प्रभावित रहे गांवों का दौरा कर न केवल खुफिया जानकारी जुटाई जा रही है, बल्कि स्थानीय लोगों में विश्वास बहाली का काम भी किया जा रहा है।
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विकास और विश्वास की नई बयार
सुरक्षा बलों की रणनीति केवल हथियारों तक सीमित नहीं है। वे गांवों में जाकर लोगों को विकास की मुख्यधारा से जुड़ने की अपील कर रहे हैं। गृह मंत्रालय को उम्मीद है कि 31 मार्च की तय समयसीमा तक बचे हुए नक्सली भी मुख्यधारा में लौट आएंगे। यदि ऐसा नहीं होता है, तो सुरक्षा बलों ने ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति के तहत अंतिम प्रहार की पूरी तैयारी कर ली है। बस्तर से लेकर झारखंड के पहाड़ों तक, हर चप्पा-चप्पा छाना जा रहा है ताकि आने वाली 1 अप्रैल को भारत एक ‘नक्सल मुक्त’ राष्ट्र के रूप में नई सुबह देख सके।

