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नई दिल्ली:

सुप्रीम कोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले के बाद नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग (NCERT) ने कक्षा 8वीं की नई सोशल साइंस (भाग-2) की टेक्स्टबुक ‘Exploring Society: India and Beyond’ में भेदभाव यानी ‘Discrimination’ की परिभाषा का दायरा काफी बड़ा कर दिया है। अब तक समाज में जाति, धर्म, नस्ल, लिंग और दिव्यांगता के आधार पर होने वाले अनुचित व्यवहार को ही भेदभाव माना जाता था, लेकिन अब इस लिस्ट में ‘आर्थिक स्थिति’ (Economic Background) को भी आधिकारिक तौर पर शामिल कर लिया गया है। पुस्तक के ‘नागरिकता: अधिकार और कर्तव्य’ (Citizenship: Rights and Duties) नामक महत्वपूर्ण अध्याय में इस नई परिभाषा को बेहद बारीकी से स्पष्ट किया गया है, जिसके अनुसार किसी भी व्यक्ति या समूह के साथ उसकी जाति, धर्म, नस्ल, जातीय पहचान, दिव्यांगता, शारीरिक बनावट, लिंग, यौन पहचान या फिर उसकी गरीब-अमीर वाली आर्थिक स्थिति के आधार पर किसी भी प्रकार का अनुचित व्यवहार करना अब सीधे तौर पर भेदभाव की कैटेगरी में आएगा।

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नई किताब में एनसीईआरटी ने इस बात पर विशेष जोर दिया है कि किसी भी आधार पर किसी इंसान के साथ भेदभाव करना न केवल नैतिक रूप से पूरी तरह गलत है, बल्कि यह देश के कानून के भी सख्त खिलाफ है। चैप्टर में इस कड़वी हकीकत को भी खुलकर सामने रखा गया है कि आर्थिक रूप से कमजोर और गरीब परिवारों के बच्चों को कई बार सामाजिक और शैक्षणिक स्तर (Social & Educational Level) पर भारी भेदभाव का सामना करना पड़ता है, जिससे उनका मानसिक विकास प्रभावित होता है और इसी गंभीर वजह से ‘आर्थिक स्थिति’ को भी भेदभाव के प्रमुख आधारों में जगह दी गई है। यह बड़ा बदलाव इस वक्त देश के शिक्षा जगत और सोशल मीडिया पर इसलिए भी भारी चर्चा का विषय बना हुआ है क्योंकि हाल ही में जारी हुए यूजीसी (UGC Regulations, 2026) के नियमों में भेदभाव की परिभाषा के तहत धर्म, जाति, नस्ल, लिंग, जन्मस्थान और दिव्यांगता को तो शामिल किया गया था, लेकिन उसमें ‘आर्थिक स्थिति’ का अलग से कोई जिक्र नहीं था। उस वक्त कई बड़े शिक्षाविदों, विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों ने यूजीसी के इस नियम पर कड़े सवाल उठाए थे और उनका तर्क था कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के साथ होने वाले भेदभाव को भी कानूनी तौर पर स्पष्ट मान्यता मिलनी चाहिए, जिसे अब एनसीईआरटी ने अपनी नई किताब में लागू करके एक नई मिसाल पेश की है।

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