रायपुर: प्रदेश में ऑनलाइन सेवाएँ देने वाली प्रमुख कंपनियों और उनमें कार्यरत लाखों ‘गिग वर्कर्स’ (स्विगी, जोमैटो, ब्लिंकिट, रैपिडो) की स्थिति को लेकर आज विधानसभा में महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई।
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विधायक अजय चंद्राकर द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री लखन लाल देवांगन ने स्पष्ट किया कि राज्य में इन श्रमिकों के लिए वर्तमान में कोई ठोस कानूनी ढांचा उपलब्ध नहीं है।
कंपनियों का कोई सरकारी रिकॉर्ड नहीं
सदन में दी गई जानकारी के अनुसार, श्रम विभाग के अंतर्गत स्विगी, जोमैटो, ब्लिंकिट और रैपिडो जैसी कंपनियाँ पंजीकृत नहीं हैं। उप मुख्य श्रमायुक्त (केन्द्रीय) और कल्याण आयुक्त द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर सरकार ने स्वीकार किया कि इन कंपनियों का पंजीकरण न होने के कारण प्रदेश में कार्यरत गिग वर्कर्स की कुल संख्या और उनमें छत्तीसगढ़ी युवाओं की भागीदारी का कोई भी आधिकारिक डेटा उपलब्ध नहीं है।
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नियमों और निगरानी का अभाव
रिपोर्ट के अनुसार, राज्य सरकार के पास इन कंपनियों को कार्य करने की अनुमति देने संबंधी कोई निर्धारित प्रक्रिया नहीं है। इसके अलावा गिग वर्कर्स की भर्ती के लिए कोई शैक्षणिक या अन्य योग्यताएं निर्धारित नहीं की गई हैं।
उनके वेतन, काम के घंटों (श्रामावधि) और आर्थिक सहायता को लेकर कोई भी नियम-शर्तें लागू नहीं होती हैं।विभाग के पास इन वर्कर्स की देख-रेख या निगरानी के लिए किसी भी स्तर के अधिकारी की व्यवस्था नहीं है।
केंद्र के पाले में सुरक्षा की गेंद
गिग वर्कर्स की सामाजिक सुरक्षा के प्रश्न पर मंत्री ने बताया कि ‘सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020’ के तहत भारत सरकार के श्रम एवं रोजगार मंत्रालय द्वारा एक ‘राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा मण्डल’ के गठन का प्रावधान है। यह मण्डल ही भविष्य में इन श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा और कल्याण के लिए जिम्मेदार होगा।
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