जतराएक सांस्कृतिक कोरिडोर जतरा मेला, जहाँ डिजिटल युग में भी सांस लेती है विरासत

ग्रामीण डेस्क: झारखंड छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक संस्कृति और ग्रामीण जीवन के उल्लास का प्रतीक रहे पारंपरिक जतरा मेले लम्बे समय से बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहे हैं। समय की करवट ने इन मेलों के स्वरूप को इतना बदल दिया है कि कभी मेलों की जान कहा जाने वाला लकड़ी का ‘रामझूला’ अब इतिहास की परतों में कहीं खो गया है। वह ‘चरर-चरर’ की आवाज, जो कभी गांव के जतरा तक गूंजती थी और लोगों को मेले की ओर खींच लाती थी, अब मशीनों के शोर और लोहे Same गगनचुंबी ढांचों के बीच मौन हो गई है।

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झारखंड की माटी में रचे-बसे कार्तिक मेले, फागुन मेले, मकर संक्रांति और जतरा मेलों की वह सादगी अब केवल बुजुर्गों की चर्चाओं तक सीमित रह गई है।
रामझूला का निर्माण केवल मनोरंजन के लिए नहीं था, बल्कि यह ग्रामीण इंजीनियरिंग और सामूहिक सहभागिता का एक अद्भुत उदाहरण था।

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इसे बनाने के लिए कुशल कारीगर हफ्तों पहले से तैयारी शुरू कर देते थे, जिसमें जंगल से साल या सागवान की मजबूत लकड़ियों का चयन किया जाता था। बिना किसी आधुनिक वेल्डिंग मशीन, नट-बोल्ट या बिजली के उपकरणों के, इन भारी-भरकम लकड़ियों को केवल मजबूत रस्सियों, लकड़ी की खूँटियों और छेनी-हथौड़ी के जादुई संतुलन से कई फीट ऊँचा खड़ा कर दिया जाता था।

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इसे चलाने के लिए बिजली की नहीं, बल्कि इंसानी हाथों के तालमेल और शारीरिक बल की आवश्यकता होती थी, जो मेलों में आपसी भाईचारे और एकजुटता का परिचय देती थी।

आज के बदलते परिवेश पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए क्षेत्र के जानकर सदानंद राम कहते हैं कि आधुनिकता की अंधी दौड़ ने हमारे मेलों का रंग फीका कर दिया है। उनके अनुसार, पहले लकड़ी के रामझूले को खड़ा करना और उस पर बैठना एक उत्सव जैसा होता था, जिसमें लकड़ियों के जोड़ इतने सटीक होते थे कि वे बड़े से बड़ा वजन आसानी से झेल लेते थे, लेकिन आज के रेडीमेड और मशीनी झूलों ने उस मेहनत और कला की कद्र को पूरी तरह खत्म कर दिया है। अब तो बस बिजली का स्विच दबाते ही झूला घूमने लगता है, जिसमें वह रोमांच और रूह गायब है जो हमारे पुराने रामझूले में हुआ करती थी।

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इसी सांस्कृतिक क्षति पर अपनी यादें साझा करते हुए बुजुर्ग बिगलू भगत भावुक होकर बताते हैं कि रामझूला बनाना एक साधना थी जिसे बनाने वाले कारीगर लकड़ी की नब्ज पहचानते थे। उनके अनुसार, अब न तो वे मजबूत लकड़ियाँ बची हैं और न ही वे हुनरमंद हाथ जो बिना किसी इंजीनियरिंग नक्शे के इतना विशाल और सुरक्षित ढांचा खड़ा कर सकें। मशीनों और लोहे के स्ट्रक्चर ने न केवल पारंपरिक झूलों को बाहर किया है, बल्कि उन पुश्तैनी कारीगरों को भी हाशिए पर धकेल दिया है जो पीढ़ियों से इस कला को संजोए हुए थे। अब मेलों में सब कुछ कृत्रिम और व्यापारिक हो गया है।

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वहीं, गुलाम अब्बास इस बदलाव को ग्रामीण पहचान के अंत के रूप में देखते हैं। उनका कहना है कि जतरा मेले हमेशा से सादगी और मिट्टी के जुड़ाव का प्रतीक रहे हैं और रामझूला इसी संस्कृति की धड़कन था। उनके अनुसार, आज लोहे के बड़े-बड़े आधुनिक झूले आने से छोटे कारीगरों का रोजगार छिन गया है और मेलों का स्वरूप एक बाजार जैसा हो गया है। कार्तिक से लेकर फागुन तक लगने वाले इन छोटे मेलों में अब वह भावनात्मक जुड़ाव नजर नहीं आता, जो कभी हमारी पहचान हुआ करता था। मुनाफे और चकाचौंध की इस होड़ में हमने सुरक्षा के नाम पर अपनी एक अनमोल विरासत को खो दिया है, जिसे आने वाली पीढ़ियां शायद कभी देख भी न पाएं।

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