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जशपुर

छोटानागपुर के पठारी क्षेत्रों और छत्तीसगढ़ के वनांचलों में एक कहावत मशहूर है कि “जंगल की भाजी, तन-मन रखे ताजी”। इसी परंपरा का सबसे खूबसूरत हिस्सा है ‘जिरहुल’। यह महज एक फूल नहीं बल्कि आदिवासियों की संस्कृति, उनके संघर्ष और उनके पारंपरिक आयुर्वेद का जीवंत उदाहरण है।

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जिरहुल के फूल केवल हाट-बाजारों तक सीमित नहीं हैं। छोटानागपुर के कई आदिवासी समुदायों में इसे प्रकृति पूजा का हिस्सा माना जाता है। बसंत उत्सव (सरहुल के आस-पास) के दौरान कई घरों में इसे देवी-देवताओं को अर्पित करने के बाद ही प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। यह फूल खुशहाली और नई ऋतु के आगमन का प्रतीक माना जाता है।

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हालिया शोध बताते हैं कि जिरहुल के फूलों में फाइटोकेमिकल्स की अधिकता होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में बदलते मौसम के दौरान होने वाले वायरल बुखार और सर्दी-खांसी से बचने के लिए इसे ‘इम्यूनिटी बूस्टर’ के रूप में खाया जाता है। इसमें मौजूद आयरन और कैल्शियम एनीमिया (खून की कमी) से जूझ रही ग्रामीण महिलाओं के लिए एक सस्ता और सुलभ विकल्प है।

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फरवरी और मार्च के महीनों में जब खेती का काम कम होता है, तब जिरहुल ग्रामीण महिलाओं के लिए अतिरिक्त आय का जरिया बनता है। सुबह अंधेरे में उठकर कोसों दूर पहाड़ियों पर जाना और इन फूलों को चुनना उनकी मेहनत का हिस्सा है। हाट-बाजारों में इसकी बढ़ती मांग को देखते हुए अब शहरों के लोग भी इसे ‘ऑर्गेनिक फूड’ के रूप में पसंद करने लगे हैं।

एक समय था जब पहाड़ इन फूलों से लदे रहते थे, लेकिन अंधाधुंध जंगल कटाई और जलवायु परिवर्तन के कारण अब जिरहुल के पौधे कम होते जा रहे हैं। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि इस जंगली पौधे की सिस्टमैटिक फार्मिंग (व्यवस्थित खेती) की जाए, तो यह छोटे किसानों के लिए एक मुनाफे वाली नकदी फसल (Cash Crop) साबित हो सकती है।

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ग्रामीणों के अनुसार, जिरहुल को बनाने का एक खास तरीका ‘खट्टा’ डालकर भी है। उबालने के बाद इसे टमाटर, अमचूर या इमली के साथ पकाया जाता है, जिससे इसकी हल्की कड़वाहट पूरी तरह खत्म हो जाती है और यह चटपटा स्वाद देता है। कई लोग इसे सुखाकर भी रखते हैं (सूखी भाजी), ताकि बेमौसम भी इसका आनंद लिया जा सके।

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जिरहुल जैसे वन-उत्पाद हमारी उस समृद्ध विरासत का हिस्सा हैं जहाँ “भोजन ही औषधि” है। यदि हमने इन पारंपरिक व्यंजनों को अपनी थाली में जगह नहीं दी, तो आने वाली पीढ़ियां न केवल इस स्वाद को भूल जाएंगी, बल्कि जंगल से जुड़ा वह ज्ञान भी खो देंगी जो सदियों से बीमारियों से लड़ने में कारगर रहा है।

अगली बार जब आप हाट-बाजार जाएं और किसी ग्रामीण महिला को ये गुलाबी फूल बेचते देखें, तो केवल मोल-भाव न करें, बल्कि उस मेहनत और विरासत का सम्मान करें जो वो आपके लिए पहाड़ों से चुनकर लाई हैं।

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