बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने सेवानिवृत्त कर्मचारियों के वित्तीय अधिकारों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल कारण बताओ (शो-कॉज) नोटिस जारी करके किसी भी कर्मचारी के सेवानिवृत्ति लाभ (रिटायरमेंट ड्यूज) को नहीं रोका जा सकता। जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की एकलपीठ ने बिलासपुर निवासी सेवानिवृत्त डिप्टी रेंजर अजय कुमार शर्मा की याचिका को स्वीकार करते हुए वन विभाग को उनके सभी बकाया सेवानिवृत्ति लाभ 35 दिनों के भीतर जारी करने के कड़े निर्देश दिए हैं।
यह पूरा मामला पौधारोपण कार्यों में कथित नुकसान की भरपाई से जुड़ा हुआ था। विभाग ने डिप्टी रेंजर अजय कुमार शर्मा की सेवानिवृत्ति के बाद पौधारोपण में हुए नुकसान की वसूली का हवाला देते हुए उनके पेंशन और अन्य परिलाभों पर रोक लगा दी थी। इसके विरोध में सेवानिवृत्त अधिकारी ने अधिवक्ता के माध्यम से उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि विभाग ने केवल एक कारण बताओ नोटिस जारी करके उनके पूरे सेवानिवृत्ति लाभ रोक रखे थे, जो कानूनी रूप से उचित नहीं है।
अदालत ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि यदि किसी कर्मचारी के रिटायर होने के बाद उसके खिलाफ किसी प्रकार की विभागीय जांच या अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करनी है, तो उसके लिए ‘छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1976’ के नियम 9 में निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है। तय प्रक्रिया का पालन किए बिना केवल नोटिस जारी कर सेवानिवृत्ति लाभ रोकना मनमाना और अवैध है।
हाई कोर्ट ने विभाग को 35 दिनों की तय समयसीमा में याचिकाकर्ता के सभी बकाया लाभों का भुगतान सुनिश्चित करने को कहा है। इसके साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि भुगतान में हुई देरी के कारण ब्याज की मांग को लेकर याचिकाकर्ता सक्षम प्राधिकारी के समक्ष अलग से अपना अभ्यावेदन (रिप्रजेंटेशन) प्रस्तुत कर सकता है, जिस पर नियमानुसार विचार किया जाएगा।

