शक्ति उपासना का महापर्व, चैत्र नवरात्रि कल से शुरू
जशपुर नगर: छत्तीसगढ़ के जशपुर अंचल की समृद्ध सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक ‘सरहुल सरना महोत्सव’ कल, 19 मार्च 2026 को पूरे उत्साह के साथ मनाया जाएगा।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के पावन अवसर पर आयोजित होने वाले इस विराट महोत्सव में प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होकर कार्यक्रम की शोभा बढ़ाएंगे। सरहुल सरना पूजा महोत्सव समिति द्वारा आयोजित यह भव्य कार्यक्रम जशपुर नगर के प्रसिद्ध ‘दीपू बगीचा’ में संपन्न होगा।
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महोत्सव की शुरुआत सुबह 11 बजे पारंपरिक पूजा-पाठ के साथ होगी, जिसके बाद एक विशाल सांस्कृतिक सम्मेलन का आयोजन किया जाएगा। इस आयोजन में जशपुर अंचल के कोने-कोने से हजारों की संख्या में वनवासी भाई-बहन अपनी पारंपरिक वेशभूषा में शामिल होंगे।
प्रकृति का महापर्व सरहुल: जब मांदर की थाप पर झूम उठती है धरती और महक उठता है सखुआ-साल
ग्रामीण जन अपने साथ सरई फूल, नारियल, धूपबत्ती और सरहुल झंडा लेकर पहुंचेंगे, जबकि मांदर, झांझ और नगाड़ों की गूँज के साथ पारंपरिक नृत्य मंडलियाँ अपनी कला का प्रदर्शन करेंगी। यह महोत्सव न केवल नववर्ष के स्वागत का उत्सव है, बल्कि प्रकृति और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का एक सशक्त माध्यम भी है।
माटी की धड़कन और ताल की पहचान लोक गीतों और लोक नृत्यों में बसती भारतीय संस्कृति की आत्मा
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथियों में श्रीमंत राजा रणविजय प्रताप सिंह जूदेव, माननीय सत्यानंद सिंह, श्रीमती कौशल्या साय, राजा देवेन्द्र प्रताप सिंह, गणेश राम भगत, और श्रीमती गोमती साय सहित क्षेत्र के कई गणमान्य नागरिक और जन प्रतिनिधि विशेष रूप से उपस्थित रहेंगे।
आदिवासी संस्कृति की धड़कन: मांदर की थाप और परंपराओं का संगम
आयोजन समिति ने बताया कि कल्याण आश्रम के निरंतर प्रयासों और जन सहयोग से सरना पूजा स्थलों की सुरक्षा और उनके सांस्कृतिक महत्व को अक्षुण्ण बनाए रखने की दिशा में यह एक बड़ा कदम है।
प्रकृति की गोद जशपुर और सरगुजा में जनजातीय आस्था का महापर्व सरहुल
समिति के अध्यक्ष श्री जगेश्वर राम, उपाध्यक्ष श्री मनीजर राम भगत और महामंत्री श्री गोविन्द राम भगत ने समाज के सभी वर्गों से इस विराट सरहुल सरना महोत्सव में शामिल होकर इसे सफल बनाने की अपील की है। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य अपनी सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखना और सरना देव स्थलों के संरक्षण के प्रति जन-जागरूकता फैलाना है।
क्यों मनाया जाता है सरहुल
सरहुल पर्व मनाने के पीछे प्रकृति, अध्यात्म और कृषि चक्र का एक गहरा संगम है। मुख्य रूप से यह पर्व प्रकृति की पूजा का उत्सव है, जो वसंत ऋतु के आगमन और साल (सरई) के वृक्षों पर नए फूलों के खिलने के साथ शुरू होता है।.
जनजातीय समाज में साल के वृक्ष को अत्यंत पवित्र माना जाता है क्योंकि मान्यता है कि उनके आराध्य देव ‘सिंगबोंगा’ या ‘धर्मेश’ का निवास इन्हीं पावन कुंजों यानी ‘सरना’ स्थलों में होता है। इसलिए, नए साल की शुरुआत में इन पेड़ों की पूजा कर प्रकृति को धन्यवाद दिया जाता है।
इस पर्व का एक सुंदर आध्यात्मिक पक्ष धरती माता और सूर्य देव के प्रतीकात्मक विवाह से भी जुड़ा है। आदिम संस्कृति में यह माना जाता है कि इस विवाह के पश्चात ही धरती उपजाऊ होती है और सृष्टि में नव-जीवन का संचार होता है। यही कारण है कि सरहुल के बाद ही किसान अपने खेतों में नए बीज बोने की प्रक्रिया शुरू करते हैं और प्रकृति से प्राप्त नए फल-फूलों का उपयोग करना प्रारंभ करते हैं।
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इसके अलावा, सरहुल भविष्य की गणना और समुदाय की एकजुटता का भी प्रतीक है। पूजा के दौरान ‘पाहन’ (गांव के पुजारी) विशेष अनुष्ठान करते हैं जिसके माध्यम से आने वाले मानसून और फसल की पैदावार का अनुमान लगाया जाता है। यह त्योहार मनुष्य को यह संदेश देता है कि उसका अस्तित्व पूरी तरह से जल, जंगल और जमीन की सुरक्षा पर निर्भर है। मांदर की थाप और पारंपरिक नृत्यों के साथ मनाया जाने वाला यह पर्व असल में मनुष्य और प्रकृति के अटूट रिश्ते का उत्सव है।
वनवासी समाज के लिए सरहुल केवल एक पर्व नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व, पहचान और जीवन दर्शन का आधार है। उनके लिए इसका सबसे बड़ा महत्व प्रकृति के साथ अटूट संबंध में निहित है। वनवासी समुदाय खुद को प्रकृति का संरक्षक मानता है और सरहुल वह समय है जब वे जल, जंगल और जमीन के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं। उनके विश्वास के अनुसार, साल (सरई) के वृक्षों में उनके आराध्य देव का वास होता है, इसलिए इन पेड़ों की पूजा करना उनके लिए अपने ईश्वर की साक्षात् उपस्थिति को नमन करने जैसा है।
सामाजिक दृष्टि से भी इसका महत्व अद्वितीय है। यह पर्व पूरे समुदाय को एक सूत्र में पिरोता है। ‘सरना स्थल’ पर गांव के सभी लोग एकत्रित होते हैं, जिससे आपसी भाईचारा और एकता मजबूत होती है। वनवासी जीवन में सामूहिक नृत्य और संगीत का विशेष स्थान है, और सरहुल के दौरान मांदर की थाप पर होने वाले नृत्य उनके सांस्कृतिक गौरव को जीवित रखते हैं। यह अवसर उन्हें अपनी परंपराओं, वेशभूषा और लोक गीतों को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का मंच प्रदान करता है।
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आर्थिक और कृषि के नजरिए से देखें तो वनवासियों के लिए सरहुल नए कार्य सत्र की शुरुआत है। वे मानते हैं कि इस पूजा के बाद ही धरती माता बीज स्वीकार करने के लिए तैयार होती हैं। पूजा के दौरान पाहन द्वारा की जाने वाली बारिश की भविष्यवाणी उनके कृषि कार्यों की योजना बनाने में मदद करती है।
साथ ही, यह पर्व उन्हें पर्यावरण संरक्षण की सीख भी देता है; वे प्रण लेते हैं कि वे जंगलों की रक्षा करेंगे, क्योंकि जंगल ही उनकी आजीविका और जीवन का मुख्य स्रोत हैं। संक्षेप में, सरहुल वनवासी समाज के लिए उनकी आस्था, परंपरा और पर्यावरण के प्रति समर्पण का सबसे पवित्र संगम है।

