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छत्तीसगढ़ और झारखंड की सीमा पर बसे शारदा धाम को देखकर यह एहसास अपने आप गहराने लगता है कि आस्था के सामने भौगोलिक रेखाएं कितनी छोटी हो जाती हैं। जशपुर जिले के दुलदुला विकासखंड से सटे सघन वन क्षेत्र में स्थित यह धाम आज केवल एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक एकता का जीवंत प्रतीक बन चुका है।
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गिरमा नदी के कलकल प्रवाह के बीच स्थापित माँ शारदा का यह मंदिर देश के उन चुनिंदा स्थलों में शामिल है जहाँ प्रवेश झारखंड से होता है और दर्शन छत्तीसगढ़ की धरती पर संपन्न होते हैं। यह अनोखा संयोग किसी स्थापत्य प्रयोग का नहीं बल्कि प्रकृति और आस्था के सहज मेल का परिणाम है। यही कारण है कि यहाँ पहुँचने वाला हर श्रद्धालु पहले सीमा देखता है फिर उसे भूल जाता है।
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कभी देवाघाघ नाम से पहचाना जाने वाला यह निर्जन वन क्षेत्र वर्ष 1998 के बाद आस्था का प्रमुख केंद्र बनता चला गया। महान संत असीमानंद जी महाराज ने इस स्थान की आध्यात्मिक ऊर्जा को पहचाना और इसे माँ शारदा को समर्पित किया। उनके संकल्प को सामाजिक स्वरूप तब मिला जब कुमार दिलीप सिंह जूदेव ने कस्तुरा से गिरमा तट तक ऐतिहासिक पदयात्रा कर इस धाम को जनमानस से जोड़ा। रामरेखा बाबा के सान्निध्य में ज्ञान और शिव तत्व का जो समन्वय यहाँ हुआ उसने इस क्षेत्र को साधना और सेवा का केंद्र बना दिया।
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शारदा धाम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ पूजा के साथ भविष्य निर्माण की साधना भी होती है। माँ सरस्वती के चरणों में बैठकर आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चे निःशुल्क शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। नियमित शैक्षणिक शिविर और ज्ञान संस्कार कार्यक्रम इस बात का प्रमाण हैं कि यह धाम समाज को केवल आस्था नहीं दिशा भी दे रहा है।
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बसंत पंचमी के अवसर पर लगने वाला विशाल मेला अब दो राज्यों की साझा सांस्कृतिक पहचान बन चुका है। गिरमा नदी पर बना पुल केवल आवाजाही का माध्यम नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ और झारखंड के बीच भावनात्मक सेतु का काम करता है। यहाँ भाषा अलग हो सकती है लेकिन भावना एक होती है।
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शारदा धाम आज उस भारत की तस्वीर पेश करता है जहाँ सीमाएं प्रशासनिक होती हैं आस्था की नहीं। यह धाम बताता है कि जब उद्देश्य लोककल्याण हो और भावना सेवा की हो तो नक्शों की लकीरें भी झुक जाती हैं। गिरमा तट पर विराजी माँ शारदे की यह चौखट अब केवल मंदिर नहीं बल्कि राष्ट्रीय एकता की मौन पाठशाला बन चुकी है।
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