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नई दिल्ली।
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर उठ रहे सवालों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम और सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने साफ किया है कि किसी भी पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची से बिना उचित सूचना और सुनवाई के नहीं हटाया जा सकता। इसी उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि जिन मतदाताओं के नाम ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ यानी तार्किक विसंगति की श्रेणी में रखे गए हैं, उनकी सूची ग्राम पंचायत भवनों, ब्लॉक कार्यालयों और शहरी वार्ड कार्यालयों में सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित की जाए।
यह निर्देश ऐसे समय में आया है जब बिहार में एसआईआर का पहला चरण पूरा हो चुका है और अब यह प्रक्रिया छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, केरल, मध्य प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल सहित नौ राज्यों तथा तीन केंद्र शासित प्रदेशों में चल रही है। तमिलनाडु से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिन मतदाताओं के नामों में विसंगतियां बताई गई हैं, उन्हें अपनी बात रखने और दस्तावेज पेश करने का पूरा अवसर मिलना चाहिए।
अदालत ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग ने मतदाताओं को मैप्ड, अनमैप्ड और तार्किक विसंगति की श्रेणियों में विभाजित किया है। तार्किक विसंगति में पिता के नाम में अंतर, माता-पिता या दादा-दादी की उम्र में असामान्य फर्क, या असामान्य रूप से अधिक संतान संख्या जैसे मामले शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि इस तरह की कई त्रुटियां दस्तावेजी या डाटा एंट्री की गलती से भी हो सकती हैं, इसलिए केवल इन्हीं आधारों पर नाम हटाना उचित नहीं है।
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कोर्ट ने निर्देश दिया है कि तार्किक विसंगति की सूची सार्वजनिक होने के बाद प्रभावित मतदाताओं को अतिरिक्त दस दिन का समय दिया जाए, ताकि वे अपने दस्तावेजों के साथ आपत्ति दर्ज करा सकें। मतदाता स्वयं उपस्थित होकर या अपने अधिकृत प्रतिनिधि के माध्यम से भी सुधार का दावा कर सकेंगे। यहां तक कि बूथ लेवल एजेंट को भी प्रतिनिधि बनाया जा सकता है, बशर्ते उसके पास मतदाता द्वारा हस्ताक्षर या अंगूठे के निशान से जारी प्राधिकरण पत्र हो।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों की जिम्मेदारी भी तय की है। अदालत ने कहा है कि पंचायत भवनों और कार्यालयों में जांच व सुनवाई की प्रक्रिया सुचारु रूप से चलाने के लिए चुनाव आयोग को पर्याप्त कर्मचारी और संसाधन उपलब्ध कराए जाएं। इसके साथ ही जिला प्रशासन और पुलिस अधिकारियों को कानून-व्यवस्था बनाए रखने और पूरी प्रक्रिया को बाधारहित संपन्न कराने के निर्देश दिए गए हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हर प्रभावित व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से या प्रतिनिधि के माध्यम से सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य होगा।
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सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने लोकतंत्र की मूल भावना पर जोर देते हुए कहा कि मतदाता सूची से नाम हटना सीधे तौर पर मतदान के मौलिक अधिकार को प्रभावित करता है। इसलिए पारदर्शिता, समयबद्ध प्रक्रिया और सुनवाई का अवसर लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अत्यंत आवश्यक है। अदालत का मानना है कि इन निर्देशों से मतदाता सूची की प्रक्रिया में लोगों का भरोसा मजबूत होगा और किसी भी पात्र नागरिक का अधिकार बिना वजह प्रभावित नहीं होगा।

