भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था में समानता और भेदभाव को खत्म करने की कोशिशों को सुप्रीम कोर्ट से एक बड़ा झटका लगा है। शीर्ष अदालत ने गुरुवार को यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) द्वारा हाल ही में जारी किए गए ‘इक्विटी रेग्युलेशंस 2026’ पर अंतरिम रोक लगा दी है। छात्र और शिक्षाविद् लंबे समय से इन नियमों का विरोध कर रहे थे, और अब कोर्ट ने भी माना है कि इन नियमों में न केवल स्पष्टता की कमी है, बल्कि इनके गलत इस्तेमाल की भी भारी आशंका है। आखिर क्यों कोर्ट को दखल देना पड़ा और अब कैंपस में क्या बदलेगा? आइए विस्तार से समझते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: आखिर कमी कहाँ रह गई?
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि प्रथम दृष्टया इन नियमों में “अस्पष्टता” नजर आती है। कोर्ट का मानना है कि नए नियमों का मसौदा तैयार करते समय कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं को नजरअंदाज किया गया है। याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि ये नियम समावेशी होने के बजाय कुछ खास समूहों को समाज से अलग-थलग करने वाले हैं। कोर्ट ने केंद्र सरकार और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को निर्देश दिया है कि वे एक विशेषज्ञ समिति का सुझाव दें जो इन नियमों की बारीकी से जांच कर सके।
फिलहाल 2012 के नियम ही रहेंगे प्रभावी
जब तक इस मामले का निपटारा नहीं हो जाता और नए नियमों को दोबारा ड्राफ्ट नहीं किया जाता, तब तक विश्वविद्यालयों में UGC 2012 के पुराने नियम ही लागू रहेंगे। इसका मतलब है कि भेदभाव रोकने के लिए जो पुरानी व्यवस्था थी, वही फिलहाल कैंपस में मान्य होगी। कोर्ट ने साफ़ किया कि संवैधानिक और कानूनी सवालों की जांच किए बिना नए नियमों को लागू करना रिस्की हो सकता है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च को तय की गई है।
रोहित वेमुला की मां की याचिका के साथ होगी सुनवाई
यह मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि इसे रोहित वेमुला की मां द्वारा दायर पुरानी याचिका के साथ जोड़कर सुना जाएगा। रोहित वेमुला का मामला भारतीय विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव का एक बड़ा प्रतीक बन गया था। कोर्ट अब यह सुनिश्चित करना चाहता है कि UGC के नियम केवल कागजी न हों, बल्कि वे असल में छात्रों को सुरक्षा प्रदान करें। UGC New Guidelines 2026 को लेकर उठ रहे सवालों ने अब पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है। ताज़ा खबरों और अपडेट्स के लिए हमें Facebook और Instagram पर फॉलो करें।

