[विशेष रिपोर्ट | रायपुर]
छत्तीसगढ़ की पावन धरा, जहाँ की आबो-हवा में आदिम संस्कृति की सुवास और सघन वनों की अनछुई सुंदरता बसी है, आज विकास के एक स्वर्णिम युग में प्रवेश कर रही है। राज्य के मुख्यमंत्री और जमीनी आदिवासी जननेता विष्णुदेव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ का पर्यटन अब केवल सरकारी विज्ञापनों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एक सशक्त वैश्विक पहचान और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनकर उभरा है। मुख्यमंत्री ने अपनी नीतिगत स्पष्टता और आदिवासी समाज के प्रति अपने गहरे जुड़ाव से राज्य को केरल, गोवा और मनाली जैसे दिग्गज पर्यटन केंद्रों के समकक्ष खड़ा करने का बीड़ा उठाया है।
इस विज़न की सबसे बड़ी आधारशिला मुख्यमंत्री द्वारा पर्यटन को ‘उद्योग का दर्जा’ देना है। इस ऐतिहासिक निर्णय ने न केवल निवेशकों के लिए नए द्वार खोले हैं, बल्कि फिल्म सिटी कॉरिडोर और भोरमदेव मंदिर कॉरिडोर जैसे प्रोजेक्ट्स के माध्यम से राज्य की सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक स्वरूप में पेश किया है। अब छत्तीसगढ़ का पर्यटन क्षेत्र महज़ एक विभाग नहीं, बल्कि एक ऐसा आत्मनिर्भर तंत्र बन रहा है जहाँ राष्ट्रव्यापी स्तर पर किए जा रहे प्रमोशन और ‘होम-स्टे’ जैसी योजनाओं से आम ग्रामीण सीधे लाभान्वित हो रहे हैं।
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छत्तीसगढ़ सरकार की नई ‘होम-स्टे नीति 2025-2030’ राज्य के पर्यटन इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होने जा रही है। अगले पाँच वर्षों में 500 नए होम-स्टे विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है, जिसके लिए सरकार ने 10 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया है। यह नीति विशेष रूप से उन क्षेत्रों के लिए वरदान है जो सांस्कृतिक रूप से समृद्ध हैं लेकिन अब तक मुख्यधारा के पर्यटन से दूर थे। इसके माध्यम से पर्यटक होटलों की कृत्रिमता को छोड़कर सीधे आदिवासी परिवारों के साथ उनके घरों में रह सकेंगे, उनके पारंपरिक व्यंजनों का स्वाद ले सकेंगे और उनके हस्तशिल्प को करीब से देख सकेंगे। यह व्यवस्था न केवल ग्रामीण युवाओं और महिलाओं के लिए रोजगार के नए द्वार खोल रही है, बल्कि ‘वोकल फॉर लोकल’ के संकल्प को भी धरातल पर चरितार्थ कर रही है।
विशेष रूप से बस्तर और सरगुजा जैसे क्षेत्रों में, जहाँ की पहचान कभी नक्सलवाद के साये में धुंधली पड़ गई थी, वहां अब शांति और विकास का नया सवेरा हो रहा है। मुख्यमंत्री ने संकल्प लिया है कि 31 मार्च 2026 तक राज्य को नक्सलवाद से पूरी तरह मुक्त कर दिया जाएगा। जैसे-जैसे ये क्षेत्र सुरक्षित हो रहे हैं, सरकार इन्हें एक वैश्विक ‘एथनिक डेस्टिनेशन’ के रूप में ब्रांड कर रही है। अब यहाँ की पहचान बंदूकों की गूँज से नहीं, बल्कि चित्रकूट के भव्य जलप्रपातों और ‘छत्तीसगढ़ जोहार’ जैसे पुनर्जीवित होटलों की मेहमाननवाज़ी से हो रही है। जशपुर के ‘मायाली बगीचा’ को भारत सरकार द्वारा देश के प्रमुख पर्यटन सर्किट में शामिल करना और उसके विकास के लिए 10 करोड़ रुपये की स्वीकृति मिलना, मुख्यमंत्री साय की दूरदर्शी सोच का ही परिणाम है।
छत्तीसगढ़ के इस पर्यटन मॉडल की धमक अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सुनाई दे रही है। स्पेन, थाईलैंड और वियतनाम जैसे देशों में आयोजित वैश्विक यात्रा कार्यक्रमों में छत्तीसगढ़ की उपस्थिति ने दुनिया भर के सैलानियों को आकर्षित किया है। पर्यटन सेवा की गुणवत्ता को वैश्विक मानकों तक ले जाने के लिए सरकार ने ग्वालियर के सहयोग से एक विशेष गाइड प्रशिक्षण कार्यक्रम भी शुरू किया है। इस कार्यक्रम के तहत युवाओं को जापानी संस्कृति, कार्यशालाओं और अंतरराष्ट्रीय व्यवहार का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, ताकि छत्तीसगढ़ आने वाला हर विदेशी सैलानी यहाँ से सुखद यादें लेकर लौटे।
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सरगुजा की अस्मिता को विश्व पटल पर लाने के लिए मुख्यमंत्री ने मैनपाट महोत्सव को नई ऊँचाइयों पर ले जाने का निर्णय लिया है। उन्होंने घोषणा की है कि इस महोत्सव की तिथियां अब पहले से निर्धारित होंगी और इसके लिए फंड की कोई कमी नहीं होने दी जाएगी। मैनपाट को ‘छत्तीसगढ़ का शिमला’ बनाने की दिशा में बुनियादी सुविधाओं और बस स्टैंडों के निर्माण पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। कुल मिलाकर, मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय का यह प्रयास बिना किसी शोर-शराबे और आडंबर के, छत्तीसगढ़ की सच्चाई और यहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य को पूरी दुनिया के सामने एक ‘ईको-एथनिक ग्लोबल ब्रांड’ के रूप में स्थापित कर रहा है।

