आदिवासी समाज का अस्तित्व प्रकृति के साथ एकाकार होने में है। यहाँ जीवन का दर्शन किताबी ज्ञान से नहीं, बल्कि जंगल की सरसराहट, नदियों के कल-कल और ‘मांदर’ की गहरी थाप से निकलता है। आदिवासी संस्कृति में मांदर मात्र एक वाद्य यंत्र नहीं, बल्कि वह सूत्र है जो पूरे समाज को अपनी जड़ों से जोड़े रखता है।
मांदर: मिट्टी और संगीत का पवित्र मिलन
मांदर का निर्माण स्वयं प्रकृति के तत्वों से होता है। मिट्टी के खोल पर चमड़े की परत चढ़ाकर बनाया गया यह यंत्र जब बजता है, तो ऐसा लगता है मानो स्वयं धरती माता बोल रही हों। इसकी गूंज इतनी गंभीर और मोहक होती है कि यह मीलों दूर पहाड़ों की घाटियों में सुनाई देती है, जो ग्रामीणों के लिए एकता का बुलावा होता है।
उत्सव की आत्मा: जब पैर खुद थिरक उठते हैं
आदिवासी जीवन में उत्सव का अर्थ केवल प्रदर्शन नहीं, बल्कि कृतज्ञता है। सरहुल में जब साल के पेड़ों पर नए फूल आते हैं, करमा में जब प्रकृति की शक्ति को पूजा जाता है, और सोहराय में जब पशुधन का सम्मान होता है—
इन सभी अवसरों पर मांदर की थाप ही मुख्य सूत्रधार होती है। मांदर की लय पर जब सैकड़ों लोग एक-दूसरे का हाथ थामकर ‘अखड़ा’ में नाचते हैं, तो वह दृश्य सामूहिकता की सर्वोच्च मिसाल बन जाता है। यहाँ न कोई नेता होता है, न कोई अनुयायी; बस एक लय होती है और एक समाज।
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जीवन दर्शन की झलक
आदिवासी संस्कृति और मांदर की थाप हमें कुछ महत्वपूर्ण जीवन मूल्य सिखाती है: मांदर की थाप पर हर वर्ग, हर उम्र का व्यक्ति एक साथ कदम मिलाता है। मिट्टी से बने इस वाद्य की सादगी ही इसकी सबसे बड़ी सुंदरता है। यह हमें अपनी कला और पुरखों की विरासत को सहेजने की प्रेरणा देता है।
आधुनिकता के बीच अटूट पहचान
आज के डिजिटल और शोर-शराबे वाले युग में, मांदर की थाप एक सुकून भरी पुकार है। यह याद दिलाती है कि हम चाहे कितनी भी प्रगति कर लें, हमारी आत्मा हमेशा अपनी मिट्टी और परंपराओं में ही शांति पाएगी। यह केवल संगीत नहीं, बल्कि आदिवासियों के शौर्य, संघर्ष और उल्लास की सामूहिक गूंज है।
आदिवासी संस्कृति की यह झलक हमें बताती है कि जब तक मांदर बजता रहेगा, तब तक प्रकृति और मनुष्य का रिश्ता सुरक्षित रहेगा। मांदर की थाप केवल कानों तक नहीं पहुँचती, वह रूह को छूती है और कहती है— “अपनी जड़ों को मत भूलना।”
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”पहाड़ों से टकराती एक आवाज़ हूँ मैं,
आदिवासी समाज का गौरवमयी साज़ हूँ मैं।
मत समझना मुझे महज मिट्टी का एक खिलौना,
अपनी संस्कृति का सबसे बुलंद अंदाज़ हूँ मैं।”

