‘ग्रीन गोल्ड’ का कारोबार! ओडिशा से उत्तर भारत तक फैला 800 करोड़ का ‘गांजा कॉरिडोर’
प्रस्तुति: एस.समीर इरफ़ान, फैजान अशरफ एवं टीम CGNow
छत्तीसगढ़ की माटी ने कई दिग्गज देखे, लेकिन जशपुर के कुमार स्वर्गीय दिलीप सिंह जूदेव जैसा ‘स्वैग’ और ‘साहस’ किसी में नहीं था। वे केवल एक राजपरिवार के वारिस नहीं थे, बल्कि वे उन करोड़ों वनवासियों के ढाल थे जिनकी पहचान मिटाने की साजिश रची जा रही थी।
“सियासत के शतरंज पर, चाल वो सबसे आली चलता था,
महलों का राजा होकर भी, पसीने की खुशबू में पलता था।”
”झुकती होगी दुनिया सारी, बड़े-बड़े सुल्तानों के आगे,
जशपुर का वो शेर अकेला, मूंछों पर ताव देकर चलता था!
जनऔषधि सुगम’ ऐप से अब एक क्लिक पर मिलेगी सस्ती दवा की जानकारी
जूदेव की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है, एक ऐसा योद्धा जिसने महलों की मखमली जिंदगी को लात मारकर जंगलों की खाक छानी, ताकि सनातन की अखंड ज्योति जलती रहे। जब भी हिंदुत्व की रक्षा और “घर वापसी” के ऐतिहासिक शंखनाद की बात होगी, कुमार साहब का नाम स्वर्ण अक्षरों में सबसे ऊपर चमकेगा।
रामनवमी 2026: श्रद्धा, उमंग और आस्था का महापर्व; अयोध्या से लेकर हर घर तक सजेगा राम दरबार
8 मार्च 1949 को जन्मे दिलीप सिंह जूदेव ने सत्ता की राजनीति से ऊपर उठकर धर्म की सेवा को अपना मिशन बनाया। रांची के सेंट जेवियर कॉलेज से ही उन्होंने मिशनरियों के उस नेक्सस को चुनौती देना शुरू कर दिया था, जो सेवा के नाम पर धर्मांतरण का खेल खेल रहे थे।
UIDAI के ‘मिशन मोड’ अभियान से 1.2 करोड़ बच्चों का आधार बायोमेट्रिक अपडेट हुआ
इस साल मार्च से मई तक सामान्य से ज्यादा तपाएगी गर्मी IMD ने जारी किया अलर्ट
जूदेव ने केवल भाषण नहीं दिए, बल्कि वे खुद जमीन पर उतरे और हजारों आदिवासियों के पैर पखारकर उन्हें ससम्मान अपनी जड़ों की ओर लौटाया। उनके लिए राजनीति कभी कुर्सी का खेल नहीं थी, बल्कि वह अपनी संस्कृति को बचाने का सबसे बड़ा हथियार थी।
प्रकृति की गोद जशपुर और सरगुजा में जनजातीय आस्था का महापर्व सरहुल
दिलीप सिंह जूदेव यानी वो नाम, जिसने 2003 के चुनाव में अपनी मूंछों को दांव पर लगाकर तत्कालीन सरकार की चूलें हिला दी थीं। उनकी “मूंछ की शर्त” आज भी भारतीय राजनीति का वो किस्सा है, जिसे सुनकर विरोधियों के पसीने छूट जाते हैं।
“महलों की मखमली नींद छोड़, वो जंगलों का पहरेदार बना,
अपनों के खोए हुए सम्मान का, वो ही इकलौता हक़दार बना।
लोग मरते हैं कुर्सी के लिए इस दौर-ए-सियासत में,
पर वो अपनी शर्तों पर जीने वाला, ‘मूंछों का गॉडफादर’ बना।”
मार्च 2026: आस्था और उल्लास का महीना, होली से लेकर चैत्र नवरात्रि तक त्योहारों की धूम
झारखंड पुलिस की वर्दी में बदलाव: 9 मार्च से लागू होगा ड्रेस कोड, जानें क्या है नया आदेश
उन्होंने डंके की चोट पर ऐलान किया कि अगर सत्ता नहीं बदली तो मूंछ कटवा लूंगा, और फिर वो कर दिखाया जिसे लोग नामुमकिन मान रहे थे। उनकी इसी निडरता और बेबाकी ने उन्हें ‘हिंदू हृदय सम्राट’ का वो खिताब दिया, जो आज भी किसी और को नसीब नहीं हुआ।
“शान मूंछों की रखी, और आन धर्म की बचाई,
अटल इरादों से जिसने, जीत की नई इबारत सजाई।
सत्ता तो आती-जाती रही, पर वो अडिग हिमालय था,
जिसके साए में छत्तीसगढ़ ने, अपनी नई पहचान पाई।”
आपका 60 सेकंड का वीडियो बदल सकता है आपके गांव की तकदीर, जानिए कैसे!
आज छत्तीसगढ़ की कमान संभाल रहे मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय उसी ‘जूदेव पाठशाला’ के सबसे मेधावी छात्र हैं। जूदेव जी ने साय जी का हाथ पकड़कर उन्हें न केवल राजनीति का ‘अल्फाबेट’ सिखाया, बल्कि उन्हें संघर्ष और निष्ठा का वो पाठ पढ़ाया जो आज प्रदेश के सुशासन में दिखता है। यह गुरु-शिष्य की वो विरासत है, जो जूदेव के जाने के सालों बाद भी छत्तीसगढ़ को सही दिशा दिखा रही है।
NHAI का बड़ा फैसला: देश भर के टोल प्लाजा पर 5,100 से अधिक महिला कर्मचारी तैनात
“रियासतें तो बहुतों के पास थीं, पर विरासत सिर्फ जूदेव ने बनाई,
मूंछ की एक शर्त पर, जिसने पूरी हुकूमत हिलाई!”
दिलीप सिंह जूदेव का व्यक्तित्व इतना ‘विराट’ था कि उनके कट्टर दुश्मन भी सार्वजनिक रूप से उन पर उंगली उठाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे। वे एक ऐसे ‘अजातशत्रु’ थे, जिनके सिद्धांतों के कायल उनके विरोधी भी थे। वे संघर्ष, सेवा और स्वाभिमान का वो ब्रांड थे, जिसे वक्त की कोई भी लहर धुंधला नहीं कर सकती। आज उनकी जयंती पर हम उस टाइगर को सलाम करते हैं, जिसने हमें सिखाया कि अपनी मिट्टी और अपने धर्म के लिए कैसे सीना तानकर शेर की तरह दहाड़ा जाता है।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस: ‘रोटी और शांति’ के संघर्ष से ‘गिव टू गेन’ के संकल्प तक का सफर
“दुश्मन भी सजदा करे, वो किरदार था उनका,
सत्य की हुंकार में, पूरा अधिकार था उनका।
शेर की तरह जिया, और शेर की तरह विदा हुआ,
इतिहास के पन्नों पर, अमिट हस्ताक्षर था उनका।”
“स्वर्गीय दिलीप सिंह जूदेव अमर रहें!”


