झारखंड, ओड़िशा, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल के लोक गीत और लोक नृत्य: परंपरा, पहचान और विविधता की जीवंत झलक
पूर्वी भारत के चार राज्य झारखंड, ओड़िशा, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल अपनी समृद्ध लोक संस्कृति, गीतों और नृत्यों के लिए पूरे देश में विशिष्ट पहचान रखते हैं। यहां के लोक गीत और लोक नृत्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज, प्रकृति, आस्था और जीवनशैली की जीवंत अभिव्यक्ति हैं। हर राज्य की परंपरा अलग है, लेकिन मूल भाव सामूहिकता और लोक जीवन से गहराई से जुड़ा हुआ है।
झारखंड की लोक संस्कृति आदिवासी परंपराओं से गहराई से जुड़ी है। यहां के लोक गीत प्रकृति, खेती, ऋतु परिवर्तन, प्रेम, वीरता और देवी देवताओं की आराधना से जुड़े होते हैं। सरहुल, करमा, सोहराय और तुसु पर्व के दौरान विशेष गीत गाए जाते हैं। लोक नृत्यों में छऊ, करमा, झूमर, पाइका और फगुआ प्रमुख हैं। ये नृत्य सामूहिक रूप से खुले मैदानों में किए जाते हैं, जहां ढोल, मांदर और नगाड़े की थाप पर पुरुष और महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में नृत्य करते हैं। झारखंड के नृत्यों में ऊर्जा, सामूहिक तालमेल और प्रकृति से जुड़ाव साफ झलकता है।
ओड़िशा की लोक कला में शास्त्रीय और लोक परंपरा का सुंदर संगम देखने को मिलता है। यहां के लोक गीत धार्मिक कथाओं, भगवान जगन्नाथ, ग्रामीण जीवन और सामाजिक संस्कारों से जुड़े होते हैं। प्रमुख लोक नृत्यों में दालखाई, संबलपुरी, मयूरभंज छऊ और घुमुरा शामिल हैं। ये नृत्य मुख्य रूप से फसल कटाई, विवाह, धार्मिक उत्सव और पर्व त्योहारों पर किए जाते हैं। ओड़िशा के लोक नृत्यों की खास पहचान उनकी लयबद्ध गति, रंगीन वेशभूषा और शास्त्रीय प्रभाव से जुड़ी शालीनता है।
छत्तीसगढ़ को लोक गीतों और नृत्यों का गढ़ माना जाता है। यहां का लोक संगीत सीधे ग्रामीण जीवन से जुड़ा है। जस गीत, पंथी, सुआ, कर्मा, राउत नाचा और फाग गीत यहां की पहचान हैं। ये गीत देवी देवताओं की भक्ति, खेती, पशुपालन और सामाजिक परंपराओं को दर्शाते हैं। लोक नृत्य मुख्य रूप से नवरात्र, होली, दीवाली और फसल उत्सवों के समय किए जाते हैं। छत्तीसगढ़ के नृत्यों में सहजता, भावनात्मक अभिव्यक्ति और लोक आस्था की गहरी छाप दिखाई देती है।
पश्चिम बंगाल की लोक परंपरा साहित्य, संगीत और भावनाओं से भरपूर मानी जाती है। यहां के लोक गीत बाउल, भटियाली, कीर्तन और झूमुर अत्यंत लोकप्रिय हैं। ये गीत आध्यात्म, प्रेम, जीवन दर्शन और मानवीय संवेदनाओं को व्यक्त करते हैं। लोक नृत्यों में छऊ नृत्य, संथाली नृत्य और गाम्भीरा प्रमुख हैं। दुर्गा पूजा, फसल उत्सव और ग्रामीण मेलों में इन नृत्यों की खास धूम रहती है। पश्चिम बंगाल के लोक नृत्य भावप्रधान होते हैं, जहां भाव भंगिमा और संगीत का गहरा तालमेल दिखाई देता है।
चारों राज्यों की लोक परंपराओं में अंतर
चारों राज्यों के लोक गीत और नृत्य अपनी अपनी भौगोलिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को दर्शाते हैं। झारखंड और छत्तीसगढ़ की लोक कलाओं में आदिवासी जीवन और प्रकृति का प्रभाव अधिक दिखाई देता है, जबकि ओड़िशा में शास्त्रीय अनुशासन और धार्मिकता की झलक मिलती है। पश्चिम बंगाल की लोक परंपरा भावनात्मक गहराई और आध्यात्मिक चिंतन के लिए जानी जाती है। नृत्य शैली में झारखंड और छत्तीसगढ़ में सामूहिक ऊर्जा और खुलेपन का भाव है, वहीं ओड़िशा में सधे हुए कदम और पश्चिम बंगाल में भाव अभिव्यक्ति प्रमुख भूमिका निभाती है।
लोक संस्कृति की साझा विरासत
हालांकि चारों राज्यों की लोक परंपराएं अलग अलग पहचान रखती हैं, लेकिन इन सभी में सामूहिकता, प्रकृति प्रेम और लोक जीवन की सादगी एक समान है। ये लोक गीत और नृत्य आज भी ग्रामीण समाज की आत्मा हैं, जो पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखे हुए हैं।

