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 जब पूरा देश आधुनिक होली के शोर और रसायनों में डूबा होता है, तब छत्तीसगढ़ का जशपुर और झारखंड का छोटा नागपुर इलाका ‘फगुआ’ की अपनी प्राचीन और गौरवशाली परंपराओं में मग्न रहता है। यहाँ की होली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि आदिवासियों के शौर्य, प्रकृति के साथ उनके अटूट संबंध और अनुशासन का एक अनूठा जीवंत अध्याय है। इस उत्सव के पीछे सदियों पुरानी एक रोमांचक कथा छिपी है जिसके अनुसार प्राचीन काल में लिटिवीर नाम के एक निडर बालक ने अपनी बुद्धि और साहस से उस विशाल आदमखोर गिद्ध का अंत किया था जो सेमल के पेड़ पर रहकर ग्रामीणों का शिकार करता था। लोहार के बनाए तीर-धनुष से गिद्ध को मारने के बाद लिटिवीर ने उस पेड़ को जलाकर बुराई का अंत किया था और आज भी आदिवासी समाज इसी जीत की याद में ‘फग्गू काटते’ हैं तथा बुराई को अग्नि के हवाले करते हैं।

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आदिवासी समाज ने आज भी बाजारू रंगों को खुद से दूर रखा है और यहाँ आज भी लाल मिट्टी को माथे पर लगाकर धरती माता के प्रति सम्मान जताया जाता है। पलाश और धवई के फूलों को उबालकर बनाए गए औषधीय रंगों से खुशियाँ बांटी जाती हैं तथा होलिका दहन के बाद की पवित्र राख से तिलक लगाकर एक-दूसरे को बधाई देने की परंपरा आज भी कायम है। जशपुर की आदिवासी होली सामाजिक अनुशासन का भी एक बड़ा उदाहरण पेश करती है क्योंकि यहाँ मान्यता है कि जिन युवक-युवतियों की शादी तय हो चुकी है उनका होलिका दहन स्थल पर जाना प्रतिबंधित है। इसी तरह गर्भवती महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा के लिए वे जलती लकड़ी को नहीं देख सकतीं और केवल अग्नि की लौ को दूर से प्रणाम करती हैं, जबकि पहली होली पर नवविवाहिता का मायके में रहना और दूल्हे का ससुराल जाना अनिवार्य माना जाता है।

फगुआ का यह पर्व पारंपरिक पकवानों की खुशबू के बिना अधूरा रहता है जहाँ छिलका रोटी, अरसा, मालपुआ और गुड़ वाले चावल के लड्‌डू हर घर की शोभा बढ़ाते हैं। शाम होते ही मांदर, ढोल और नगाड़ों की गूँज के साथ ग्रामीण ‘फगुआ नृत्य’ में डूब जाते हैं जो वसंत ऋतु के आगमन का स्वागत करने का उनका अपना अनूठा तरीका है। बदलते समय के साथ भले ही दुनिया बदल रही हो, लेकिन जशपुर के आदिवासियों ने अपनी लाल मिट्टी, पलाश के रंगों और फगुआ के गीतों में अपनी जड़ों को आज भी पूरी श्रद्धा के साथ सुरक्षित रखा है।

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