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आज छत्तीसगढ़ की पावन धरती अपने महान संत समाज सुधारक और सतनाम पंथ के प्रवर्तक गुरुघासी दास जी की जयंती पर श्रद्धा और सम्मान से नतमस्तक है। गुरुघासी दास जयंती केवल एक ऐतिहासिक स्मृति नहीं बल्कि सत्य समानता और मानवता के मूल्यों को फिर से आत्मसात करने का अवसर है।

गुरुघासी दास जी का जन्म अठारहवीं शताब्दी में एक साधारण किसान परिवार में हुआ। उस समय समाज गहरे भेदभाव अंधविश्वास और ऊंच नीच की जंजीरों में जकड़ा हुआ था। ऐसे दौर में गुरुघासी दास जी ने सतनाम का संदेश देकर समाज को सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। उनका मूल मंत्र था मनखे मनखे एक समान यानी हर इंसान समान है चाहे उसकी जाति वर्ग या स्थिति कुछ भी हो।
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गिरौदपुरी की पवित्र भूमि पर उन्हें सत्य का बोध हुआ और वहीं से सतनाम पंथ का उदय हुआ। उन्होंने ईश्वर को निराकार माना और कर्म सत्य और नैतिकता को जीवन का आधार बताया। गुरुघासी दास जी ने पूजा पाखंड और ढोंग का विरोध किया और समाज को सरल सहज और सत्यनिष्ठ जीवन जीने का रास्ता दिखाया।
उनका संदेश केवल आध्यात्मिक नहीं बल्कि सामाजिक क्रांति का स्वर था। उन्होंने नशा मांस भक्षण हिंसा और सामाजिक कुरीतियों से दूर रहने का आह्वान किया। शिक्षा श्रम और नैतिक आचरण को उन्होंने जीवन की सच्ची साधना बताया। यही कारण है कि सतनाम पंथ आज भी सामाजिक समरसता और नैतिक मूल्यों का मजबूत आधार बना हुआ है।
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गुरुघासी दास जी का प्रभाव केवल छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं रहा बल्कि उनके विचारों ने देश के विभिन्न हिस्सों में सामाजिक चेतना जगाई। उन्होंने बिना किसी सत्ता या हथियार के सत्य और विचार की ताकत से समाज को बदलने का काम किया। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि सच्चा संत वही है जो समाज के अंतिम व्यक्ति के साथ खड़ा हो।
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आज गुरुघासी दास जयंती के अवसर पर प्रदेश भर में सतनाम समाज द्वारा शोभायात्राएं सत्संग और सेवा कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। यह दिन हमें याद दिलाता है कि समानता भाईचारा और सत्य ही किसी भी समाज की असली शक्ति है।
गुरुघासी दास जी की शिक्षाएं आज के समय में और भी प्रासंगिक हो गई हैं जब समाज फिर से भेदभाव और वैमनस्य की चुनौतियों से जूझ रहा है। यदि हम उनके बताए मार्ग पर चलें तो एक न्यायपूर्ण समतामूलक और मानवीय समाज की स्थापना संभव है।

