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नई दिल्ली | भारत में स्पैम और फर्जी कॉल्स की पहचान का पर्याय बन चुका ट्रूकॉलर अब खुद अस्तित्व के संकट से जूझता नजर आ रहा है। इसकी वजह है भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण TRAI द्वारा लागू किया जा रहा कॉलिंग नेम प्रेजेंटेशन सिस्टम यानी CNAP। इस नई व्यवस्था के बाद सवाल उठने लगे हैं कि क्या अब ट्रूकॉलर जैसे थर्ड पार्टी एप्स की जरूरत ही खत्म हो जाएगी।

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ट्रूकॉलर की शुरुआत वर्ष 2009 में स्वीडन के स्टॉकहोम में हुई थी। रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के दो छात्रों एलन ममेदी और नामी जारिंगलम ने अनजान कॉल्स से परेशान होकर इस एप को बनाया था। धीरे धीरे यह एक छोटे प्रोजेक्ट से वैश्विक टेक कंपनी बन गया। भारत में 2014 के बाद स्पैम कॉल्स के बढ़ते प्रकोप ने ट्रूकॉलर को जबरदस्त लोकप्रियता दिलाई। आज भारत इसके लिए सबसे बड़ा बाजार है जहां 25 करोड़ से अधिक यूजर्स इसका इस्तेमाल करते हैं।

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ट्रूकॉलर की ताकत इसकी क्राउडसोर्सिंग तकनीक रही है जिसमें यूजर्स खुद स्पैम कॉल्स को रिपोर्ट करते हैं। इसी के आधार पर इसका डेटाबेस तैयार होता है। भारत की अहमियत को देखते हुए कंपनी ने 2018 से भारतीय यूजर्स का डेटा देश में ही स्टोर करना शुरू किया। नवंबर 2024 में संस्थापकों के हटने के बाद भारतीय मूल के ऋषित झुनझुनवाला को कंपनी की जिम्मेदारी सौंपी गई।

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लेकिन अब ट्रूकॉलर के सामने सबसे बड़ी चुनौती CNAP के रूप में सामने आई है। यह सिस्टम किसी एप पर निर्भर नहीं होगा बल्कि सीधे टेलीकॉम नेटवर्क के जरिए काम करेगा। जियो एयरटेल और वीआई जैसे ऑपरेटर्स के नेटवर्क पर कॉल आने पर कॉलर का नाम केवाईसी दस्तावेजों के आधार पर सीधे मोबाइल स्क्रीन पर दिखाई देगा। यानी यूजर को किसी थर्ड पार्टी एप को कॉन्टैक्ट एक्सेस देने या फोन में अतिरिक्त एप इंस्टॉल करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

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CNAP की सबसे बड़ी खासियत इसकी विश्वसनीयता और प्राइवेसी मानी जा रही है। नेटवर्क स्तर पर कॉलर की पहचान होने से गलत नाम या फर्जी टैग की आशंका कम होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे ही यह सेवा पूरी तरह लागू होगी बड़ी संख्या में यूजर्स ट्रूकॉलर को अनइंस्टॉल कर सकते हैं। इससे ट्रूकॉलर का विज्ञापन आधारित और प्रीमियम सब्सक्रिप्शन मॉडल बुरी तरह प्रभावित हो सकता है।

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टेक विशेषज्ञों के अनुसार अब ट्रूकॉलर को सिर्फ कॉलर नेम दिखाने वाले एप से आगे बढ़ना होगा। अगर कंपनी को टिके रहना है तो उसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित फ्रॉड डिटेक्शन बिजनेस कम्युनिकेशन और एडवांस सिक्योरिटी फीचर्स पर फोकस करना होगा। फिलहाल कंपनी की ओर से CNAP को लेकर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

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डिजिटल युग में यह मुकाबला अब साफ दिखाई दे रहा है। एक ओर सरकारी और टेलीकॉम नेटवर्क आधारित भरोसेमंद सिस्टम है तो दूसरी ओर वर्षों से यूजर्स की आदत बन चुका ट्रूकॉलर। आने वाला समय तय करेगा कि ट्रूकॉलर खुद को नए रूप में ढाल पाता है या फिर तकनीक की इस दौड़ में पीछे छूट जाता है।

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