केंद्रीय युवा कार्यक्रम और खेल राज्य मंत्री श्रीमती रक्षा खडसे ने आज बस्तर प्रवास के दौरान छत्तीसगढ़ में महिलाओं की आत्मनिर्भरता और स्थानीय शिल्प कला की जमकर तारीफ की। उन्होंने जगदलपुर में ‘छत्तीस कला’ के तहत प्रगति महिला स्वयं सहायता समूह (SHG) के विकास केंद्र और स्टालों का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने स्थानीय महिला उद्यमियों द्वारा तैयार किए गए उत्पादों की समीक्षा की और उनसे सीधा संवाद कर उनका उत्साहवर्धन किया।
आर्थिक आजादी का नया मार्ग: महतारी वंदन और लखपति दीदी योजना
श्रीमती खडसे ने राज्य में महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में हो रही प्रगति को रेखांकित करते हुए कहा कि स्वयं सहायता समूह ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक परिवर्तन के बड़े वाहक बन रहे हैं। उन्होंने विशेष रूप से ‘महतारी वंदन योजना’ का उल्लेख करते हुए बताया कि कैसे यह योजना महिलाओं को वित्तीय मजबूती प्रदान कर रही है। साथ ही, ‘लखपति दीदी योजना’ और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के माध्यम से स्थानीय उत्पादों की वैश्विक पहुंच ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा दी है।
बस्तर की ‘धोकरा कला’ ने मोहा मन
मंत्री महोदया ने बस्तर के चिलकुटी गांव की अपनी यात्रा के दौरान वहां की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का जायजा लिया। उन्होंने आदिवासी धातु कला के प्रतिष्ठित रूप ‘धोकरा कला’ (लॉस्ट-वैक्स तकनीक) को बारीकी से देखा। उन्होंने जोर देकर कहा कि बस्तर के कारीगरों की यह पारंपरिक कला केवल शिल्प नहीं, बल्कि एक जीवंत संस्कृति है। इन परंपराओं का संरक्षण न केवल विरासत को बचाए रखता है, बल्कि स्थानीय समुदायों के लिए स्थायी आजीविका के अवसर भी पैदा करता है।
प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में संवाद
इस खास दौरे के दौरान जिला कलेक्टर श्री आकाश छिकारा (IAS), पुलिस अधीक्षक श्री शलभ सिन्हा (IPS), जिला पंचायत सीईओ श्री प्रतीक जैन (IAS) और एसडीएम श्री गगन शर्मा भी उपस्थित रहे। श्रीमती खडसे ने सभी महिला उद्यमियों और कारीगरों को अपनी पहलों को और आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने विश्वास जताया कि छत्तीसगढ़ का यह मॉडल ‘नारी शक्ति’ के नेतृत्व में ‘आत्मनिर्भर भारत’ के निर्माण की दिशा में एक बड़ा कदम साबित होगा।
बस्तर की माटी की कला और स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं का संघर्ष आज पूरे देश के लिए एक प्रेरणा बन गया है। केंद्रीय मंत्री का यह दौरा न केवल बस्तर के शिल्पकारों के लिए प्रोत्साहन का विषय है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि जब परंपरा और आधुनिक विकास के अवसर मिलते हैं, तो समावेशी विकास की एक नई इबारत लिखी जाती है।

