बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद और तलाक से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए पति की तलाक की अपील खारिज कर दी है। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया है कि पत्नी द्वारा पति को ‘मोटा’ और ‘सांवला’ कहना अपने आप में मानसिक या शारीरिक क्रूरता (Cruelty) अथवा परित्याग साबित करने के लिए पर्याप्त कानूनी आधार नहीं है। इसके साथ ही उच्च न्यायालय ने परिवार न्यायालय (फैमिली कोर्ट), जांजगीर-चांपा के पूर्व आदेश को पूरी तरह बरकरार रखा है।
विवाह के तीन महीने बाद ही शुरू हो गया था विवाद
मामले के विवरण के अनुसार, आकाश और पूजा का विवाह 7 मार्च 2019 को हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार संपन्न हुआ था: पति ने याचिका में आरोप लगाया था कि शादी के बाद पत्नी केवल तीन महीने ही उसके साथ रही। इसके बाद दोनों के बीच अक्सर झगड़े होने लगे।पति का कहना था कि पत्नी उसके साथ गलत व्यवहार करती थी, उसके रंग-रूप पर तंज कसते हुए उसे ‘मोटा’ और ‘सांवला’ कहती थी तथा बार-बार घर छोड़कर जाने की धमकियां देती थी। इन्हीं आधारों पर पति ने वैवाहिक क्रूरता का हवाला देते हुए तलाक की डिक्री मांगी थी।
ठोस साक्ष्यों का अभाव, केवल जुबानी आरोपों से क्रूरता साबित नहीं
डिवीजन बेंच ने 18 सितंबर को मामले की विस्तृत सुनवाई के बाद फैसला सुनाते हुए पति की दलीलों को खारिज कर दिया:अदालत ने पाया कि पति की ओर से पत्नी पर दुर्व्यवहार के कई जुबानी आरोप लगाए गए हैं, लेकिन उन्हें कानूनी रूप से सिद्ध करने के लिए कोई ठोस और पुख्ता साक्ष्य (Evidence) पेश नहीं किया गया।कोर्ट ने रेखांकित किया कि वैवाहिक जीवन में रंग-रूप या शारीरिक बनावट को लेकर की गई ऐसी सामान्य टिप्पणियां हिंदू विवाह अधिनियम के तहत ‘क्रूरता’ की कानूनी परिभाषा में नहीं आतीं, जिसके आधार पर विवाह विच्छेद (तलाक) का आदेश दिया जा सके।
फैमिली कोर्ट जांजगीर-चांपा के आदेश पर हाईकोर्ट की मुहर
इससे पूर्व परिवार न्यायालय, जांजगीर-चांपा ने भी पति की तलाक याचिका को आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया था। इसके खिलाफ पति ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। उच्च न्यायालय ने सभी रिकॉर्ड्स और तथ्यों की समीक्षा के बाद फैमिली कोर्ट के निर्णय को सही ठहराया और पति की अपील को अंतिम रूप से निरस्त कर दिया।


