वन नेशन वन राशन कार्ड’ योजना :छत्तीसगढ़ में ’54 लाख से अधिक कार्डधारकों को मिल रहा लाभ
केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय ने ‘विकसित भारत-जी राम जी अधिनियम, 2025’ के लिए एक विशेष लोगो डिज़ाइन प्रतियोगिता का आयोजन किया है। यह प्रतियोगिता सरकारी पोर्टल MyGov के माध्यम से आयोजित की जा रही है, जिसका उद्देश्य देश के रचनात्मक नागरिकों को एक ऐसा लोगो तैयार करने का अवसर देना है जो समावेशी विकास, रोजगार सृजन और ग्रामीण प्रगति को प्रभावी ढंग से प्रदर्शित कर सके।
इस प्रतियोगिता के विजेता को ग्रामीण विकास मंत्रालय की ओर से 50 हजार रुपये का नकद पुरस्कार दिया जाएगा। चयन के बाद इस लोगो को अधिनियम का आधिकारिक लोगो माना जाएगा और भविष्य में मंत्रालय द्वारा सभी सरकारी प्रचार-प्रसार और आधिकारिक कार्यों के लिए इसका उपयोग किया जाएगा।
प्रतियोगिता में भाग लेने के इच्छुक प्रतिभागी MyGov पोर्टल (https://bit.ly/3Pp6vi8) पर जाकर पंजीकरण कर सकते हैं और अपनी प्रविष्टि जमा कर सकते हैं। प्रविष्टि जमा करने की अंतिम तिथि 20 मार्च, 2026 है। प्रतिभागी ध्यान रखें कि लोगो पूरी तरह से मौलिक और अप्रकाशित होना चाहिए और किसी भी प्रकार से कॉपीराइट नियमों का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। डिज़ाइन सरल, रचनात्मक और प्रभावशाली होना चाहिए ताकि उसका उपयोग प्रिंट, डिजिटल मीडिया और मोबाइल एप्लिकेशन जैसे विभिन्न प्लेटफॉर्मों पर आसानी से किया जा सके।
छत्तीसगढ़ के 2740 धान खरीदी में केंद्रों पर बायोमेट्रिक व्यवस्था लागू, अब तक 2.86 करोड़ का खर्च
लोगो को हाई-रिज़ॉल्यूशन डिजिटल फॉर्मेट (JPEG/PNG/PDF, न्यूनतम 300 DPI) में ऑनलाइन जमा कराना अनिवार्य है। साथ ही, प्रतिभागियों को अपने डिज़ाइन के साथ 50 से 100 शब्दों का एक संक्षिप्त विवरण भी देना होगा, जिसमें डिज़ाइन की अवधारणा को स्पष्ट किया गया हो। इस बात का भी ध्यान रखें कि प्रत्येक प्रतिभागी केवल एक ही प्रविष्टि जमा करा सकता है।
‘विकसित भारत-जी राम जी अधिनियम, 2025’ ग्रामीण विकास की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है, जो ग्रामीण परिवारों को मिलने वाली मजदूरी रोजगार की वैधानिक गारंटी को 100 दिनों से बढ़ाकर 125 दिन करता है। इसका मुख्य उद्देश्य समावेशी विकास और सरकारी योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन के जरिए ग्रामीण भारत को आत्मनिर्भर बनाना है। अधिक जानकारी के लिए इच्छुक प्रतिभागी सीधे MyGov पोर्टल (www.mygov.in) पर जाकर प्रतियोगिता पृष्ठ देख सकते हैं।
”अभी भी बरकरार है देसी रंगीन और रसीली शहतूत की धाक: जंगलों से निकलकर हाट-बाज़ारों तक का सफर”

