जशपुर। अगर आप सोच रहे हैं कि कटहल का स्वाद चखने के लिए अभी दो महीने का इंतज़ार करना होगा, तो आप गलत हैं। जशपुर के बाज़ारों में ‘देसी कटहल’ ने न केवल दस्तक दे दी है, बल्कि अपनी खुशबू से मांसाहार के शौकीनों का ध्यान भी भटका दिया है।
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मौसम को मात देकर वक्त से पहले पहुंचे इस कटहल की दीवानगी ऐसी है कि लोग सौ रुपये में एक पीस भी हंसते-हंसते खरीद रहे हैं।
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कुदरत का करिश्मा: जब वक्त से पहले महकी डालियां
आमतौर पर कटहल की फसल में अभी वक्त है, लेकिन जशपुर के कुछ चुनिंदा पुराने पेड़ों ने इस बार कुदरत के कैलेंडर को ही बदल दिया है। स्थानीय लोगों के लिए यह किसी ‘ईश्वरीय चमत्कार’ से कम नहीं है।
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सीजन से पहले आने के कारण इसकी कीमत ‘मनमानी’ है, पर स्वाद के दीवाने पैसे की परवाह नहीं कर रहे। यह खास फल केवल कुछ पुराने पेड़ों की देन है, जिसकी जानकारी केवल पारखी लोगों को ही होती है।
हाइब्रिड पर देसी का ‘हंटर’
बाजार में आजकल ‘बारहमासी’ कटहल की भरमार रहती है, लेकिन जशपुर के देसी कटहल की बात ही निराली है।
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स्थानीय निवासी गोपाल सोनी, बताते है कि “हाइब्रिड और देसी के स्वाद में जमीन-आसमान का फर्क है। असली देसी कटहल की जो सोंधी सुगंध और बनावट होती है, वह हाइब्रिड में कभी नहीं मिल सकती। कई लोग धोखा खा जाते हैं, लेकिन असली पारखी जानता है कि असली स्वाद कहां है।”
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मटन-चिकन भी इसके स्वाद के आगे फेल!
जशपुर का यह शुरुआती देसी कटहल अपनी बेहतरीन बनावट और स्वाद के लिए मशहूर है। जानकारों की मानें तो जब इसे खास मसालों के साथ पकाया जाता है, तो इसका स्वाद बड़े-बड़े नॉन-वेज व्यंजनों को मात दे देता है। यही वजह है कि जशपुर से यह ‘हरा सोना’ बनारस, धनबाद और कोलकाता जैसे बड़े शहरों तक की थालियों की शान बनता है।
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कैसे पहचानें असली ‘देसी’ कटहल?
विशेषज्ञों के अनुसार, अगर आप भी कटहल प्रेमी हैं तो इन बातों का ध्यान रखें:देसी कटहल कटते ही अपनी विशिष्ट खुशबू से कमरा महका देता है। इसके रेशे पकाने के बाद ज्यादा नरम और स्वाद सोखने वाले होते हैं।हाइब्रिड के मुकाबले ये थोड़े अलग और कुदरती बनावट वाले होते हैं।
फिलहाल तो जशपुर के बाजार में इस ‘बेवक्त’ आए मेहमान ने धूम मचा रखी है। अगर आप भी स्वाद के शौकीन हैं, तो जेब ढीली करने के लिए तैयार हो जाइए, क्योंकि यह जायका दोबारा साल भर बाद ही मिलेगा!
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