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फरवरी की हवाओं में इस बार एक अजीब सी कशिश होती है। छत्तीसगढ़ और झारखण्ड के जंगल पहाड़ों घाटियों और यहाँ सघन वनों में पलाश अपनी लालिमा बिखेरने लगा है, जिसे देखकर लगता है मानो प्रकृति खुद को किसी उत्सव के लिए तैयार कर रही हो। इसी बसंती बयार के साथ आदिवासी बाहुल्य उरांव बहुल अंचलों में एक अनोखा संगम देखने को मिलता है, जहाँ पश्चिम से आया ‘वैलेंटाइन वीक’ और सदियों पुरानी आदिवासी प्रेम परंपराएं एक-दूसरे के गले मिल रही हैं।

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आदिवासी संस्कृति में प्रेम कभी बंद कमरों या छिपकर किए जाने वाले इकरार का नाम नहीं रहा। यहाँ प्रेम का जन्म ‘अखडा’ की धूल और ‘जतरा’ की सामूहिक ऊर्जा के बीच होता है। जहाँ दुनिया प्रपोजल के लिए एकांत खोजती है, वहीं उरांव युवा हजारों की भीड़ के बीच, मांदर की थाप पर थिरकते हुए अपनी पसंद की युवती को पीतल का छल्ला या कोई छोटा सा पारंपरिक गहना भेंट कर देते हैं। यह सार्वजनिक प्रदर्शन न केवल उनके साहस को दर्शाता है, बल्कि इसमें एक ऐसी सामाजिक गरिमा होती है जिसे आज की ‘डेटिंग संस्कृति’ में ढूंढना मुश्किल है।

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समय बदला, तो प्रेम के तरीके भी बदल गए। आज का उरांव युवा डिजिटल क्रांति का हिस्सा है। अब हाथ से लिखे खतों की जगह व्हाट्सएप स्टेटस ने ले ली है और ‘प्रपोज डे’ पर लाल गुलाब देना एक नया फैशन बन गया है। कॉलेज जाने वाले युवा अब स्मार्टफोन पर ‘लव इमोजी’ भेजते हैं, लेकिन इस आधुनिकता की सबसे सुंदर बात यह है कि यह उनकी जड़ों को काटती नहीं है। स्मार्टफोन चलाने वाला वही हाथ शाम को मांदर पर वैसी ही थाप लगाता है, जैसी उसके पूर्वज लगाया करते थे।

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इस बदलते दौर में भी ‘सरई का फूल’ अपनी पवित्रता बनाए हुए है। आज भी सरहुल के आसपास जब जंगल सफेद फूलों से लद जाते हैं, तब प्रेम की सबसे सरल और मूक अभिव्यक्ति दिखाई देती है। यदि कोई युवक अपनी पसंद की युवती को सरई का फूल देता है और युवती उसे मुस्कुराकर अपने बालों में सजा लेती है, तो यह बिना एक शब्द कहे दुनिया का सबसे बड़ा ‘हाँ’ मान लिया जाता है। यहाँ न महंगे तोहफों की शर्त है, न ही किसी बनावटी वादे का शोर।

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रिश्तों को सामाजिक स्वीकृति देने का तरीका भी उतना ही अनूठा है। जब दो दिल मिल जाते हैं, तो उनके बीच ‘हंड़िया’ का आदान-प्रदान एक कानूनी मुहर की तरह काम करता है। लड़के वाले जब लड़की के घर हंड़िया लेकर पहुँचते हैं, तो वह केवल एक रस्म नहीं, बल्कि भरोसे और सम्मान की नींव होती है। यहाँ तक कि ‘ढुकु विवाह’ जैसी परंपराएं उरांव समाज की उस प्रगतिशील सोच को दिखाती हैं, जिसने सदियों पहले ही प्रेम और साथ रहने की मानवीय इच्छा को सामाजिक मर्यादा के भीतर स्वीकार कर लिया था।

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छत्तीसगढ़ के सीमावर्ती क्षेत्र सरगुजा, जशपुर से लेकर झारखंड तक फैली ये वादियाँ गवाह हैं कि परंपराएं मरती नहीं, बस नया लिबास ओढ़ लेती हैं। आज का वैलेंटाइन डे यहाँ के युवाओं के लिए कोई विदेशी आयात नहीं, बल्कि अपनी ही पुरानी भावनाओं को नए तरीके से व्यक्त करने का एक जरिया मात्र है।

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नई पीढ़ी भले ही गुलाब का फूल थाम ले, लेकिन विवाह के मंडप में वे आज भी अपने पूर्वजों की रीतियों को ही सर्वोपरि रखते हैं। यह संतुलन बताता है कि आदिवासी समाज का प्रेम प्रकृति की भाषा में लिखा गया वह पवित्र अध्याय है, जिसे आधुनिकता की स्याही और भी गाढ़ा बना रही है। जब तक सरई फूलता रहेगा, उरांव अंचलों में मोहब्बत की यह खुशबू फीकी नहीं पड़ेगी।

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