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[रायपुर/विशेष ब्यूरो]

30 जनवरी 1948 की वह शाम भले ही इतिहास के पन्नों में एक गहरा जख्म दे गई, लेकिन छत्तीसगढ़ की माटी में बापू के कदमों के निशान आज भी अमिट हैं। आज राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुण्यतिथि के अवसर पर, पेश है छत्तीसगढ़ के साथ उनके आत्मीय और क्रांतिकारी जुड़ाव पर आधारित प्रस्तुत है यह विशेष रिपोर्ट.

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आज जब पूरा देश राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को उनकी पुण्यतिथि पर नमन कर रहा है, छत्तीसगढ़ के इतिहास के पन्ने बापू की उन सुनहरी यादों को ताज़ा कर रहे हैं जिन्होंने इस अंचल की राजनीतिक और सामाजिक चेतना को हमेशा के लिए बदल दिया। छत्तीसगढ़ का गांधी जी से रिश्ता केवल एक राजनेता का नहीं, बल्कि एक ऐसे मार्गदर्शक का रहा जिन्होंने यहाँ के सीधे-साधे किसानों और शोषितों को उनके हक के लिए लड़ना सिखाया।

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कंडेल सत्याग्रह: जब बापू के नाम से झुकी ब्रिटिश हुकूमत

गांधी जी का छत्तीसगढ़ से पहला और सबसे ऐतिहासिक नाता साल 1920 में जुड़ा। धमतरी जिले के कंडेल के किसानों ने अंग्रेजों के दमनकारी ‘नहर टैक्स’ के खिलाफ भारत का पहला जल-सत्याग्रह शुरू किया था। पंडित सुंदरलाल शर्मा के आमंत्रण पर जब 20 दिसंबर 1920 को गांधी जी पहली बार रायपुर पहुँचे, तो उनके आगमन की खबर मात्र से ब्रिटिश सरकार कांप उठी। बापू के छत्तीसगढ़ की धरती पर कदम रखने से पहले ही सरकार ने झुकते हुए किसानों की मांगें मान लीं। इस जीत ने छत्तीसगढ़ में आजादी की पहली बड़ी अलख जगा दी।

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सामाजिक क्रांति: “पंडित सुंदरलाल शर्मा मेरे गुरु हैं”

बापू का दूसरा छत्तीसगढ़ प्रवास नवंबर 1933 में हुआ, जो मुख्य रूप से सामाजिक सुधारों पर केंद्रित था। इस यात्रा के दौरान उन्होंने दुर्ग, रायपुर, बिलासपुर और धमतरी का दौरा किया। जब उन्होंने देखा कि पंडित सुंदरलाल शर्मा ने उनसे भी पहले मंदिरों में दलितों के प्रवेश का अभियान शुरू कर दिया है, तो बापू ने भावुक होकर कहा था— “अछूतोद्धार के मामले में पंडित सुंदरलाल शर्मा मुझसे भी अग्रणी हैं, मैं इस कार्य में उन्हें अपना गुरु मानता हूँ।” यह छत्तीसगढ़ के जनमानस के लिए बापू की ओर से दिया गया सबसे बड़ा सम्मान था।

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रायपुर की गलियों में खादी का संदेश

अपनी यात्राओं के दौरान गांधी जी ने रायपुर के ‘आनंद समाज वाचनालय’ और ‘विक्टोरिया गार्डन’ (अब गांधी उद्यान) में विशाल जनसभाओं को संबोधित किया। उन्होंने छत्तीसगढ़ की महिलाओं से अपील की थी कि वे स्वदेशी अपनाएं और चरखा चलाएं। उन्होंने कहा था कि “आत्मनिर्भरता का रास्ता गाँवों से होकर गुजरता है।” उनके इसी मंत्र का असर था कि छत्तीसगढ़ के गांव-गांव में खादी और ग्रामोद्योग की नींव पड़ी।

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एक नजर: बापू का छत्तीसगढ़ प्रवास

1920  में रायपुर, धमतरी, कंडेल | नहर सत्याग्रह का समर्थन और किसानों को न्याय |

1933 में रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर | हरिजन उद्धार और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ जंग |

विचारों में जीवित हैं बापू

आज बापू की पुण्यतिथि पर छत्तीसगढ़ उनके ‘ग्राम स्वराज’ के सपने को अपनी योजनाओं में उतारने का प्रयास कर रहा है। कंडेल की वह नहर आज भी गवाह है कि कैसे एक सत्य के पुजारी ने बिना हथियार उठाए किसानों को जीत दिलाई थी। आज छत्तीसगढ़ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और न्याय की संकल्पना में बापू के विचार और उनकी सादगी साफ झलकती है। कंडेल से शुरू हुआ वह सफर आज भी हर छत्तीसगढ़िया के स्वाभिमान में जीवित है।

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