संभलकर चलिए! छत्तीसगढ़ के इन तीन नेशनल हाईवे और चार घाटियों पर मंडरा रहा है ‘काल’ ; 6 साल में निगल गए 33 हजार से ज्यादा मासूम जिंदगियां 

देशभर में सड़क हादसों, हार्ट अटैक और स्ट्रोक के मामले जिस तेजी से बढ़ रहे हैं, उसने चिकित्सा जगत और आम जनता की चिंता बढ़ा दी है। इन आपातकालीन स्थितियों में वैसे तो हर एक मिनट कीमती होता है, लेकिन एमजीएम मेडिकल कॉलेज के फॉरेंसिक विभाग द्वारा किए गए एक हालिया शोध में बेहद चौंकाने वाला और संवेदनशील खुलासा हुआ है। शोध के मुताबिक, सड़क हादसों में घायल लोगों की जान बचाने के चक्कर में जो भीड़ इकट्ठा होती है, वह अनजाने में एक बड़ी गलती कर बैठती है। दुर्घटना के बाद घायल व्यक्ति की गर्दन को जरूरत से ज्यादा हिलाने या गलत तरीके से उठाने के कारण कई मरीज अस्पताल पहुंचने से पहले या इलाज के दौरान दम तोड़ रहे हैं।

फॉरेंसिक विभाग के आंकड़े डराने वाले हैं। वर्ष 2025 में हुए सड़क हादसों में जिन 74 लोगों की मौत हुई, उनमें से 44 लोगों की गर्दन की हड्डी टूटी हुई पाई गई थी। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इनमें से 23 लोग अस्पताल तक जिंदा पहुंचे थे, लेकिन गर्दन के अत्यधिक हिल जाने के कारण अंदरूनी तंत्रिका तंत्र (नर्वस सिस्टम) को पहुंचे नुकसान की वजह से उन्हें बचाया नहीं जा सका। चिकित्सा विशेषज्ञों का साफ कहना है कि रीढ़ और गर्दन की हड्डी टूटने के बाद यदि मरीज को जरा भी गलत ढंग से हिलाया जाए, तो वह या तो हमेशा के लिए लकवाग्रस्त (Paralyzed) हो सकता है या उसकी तत्काल मौत हो सकती है।

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‘गोल्डन ऑवर’ और प्राथमिक उपचार की कमी बनी काल

चिकित्सा विज्ञान में किसी भी बड़ी मेडिकल इमरजेंसी के बाद के शुरुआती एक घंटे को ‘गोल्डन ऑवर’ कहा जाता है। यदि इस एक घंटे के भीतर मरीज को सही और सटीक इलाज मिल जाए, तो उसके बचने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। शहर में रोजाना आने वाले इमरजेंसी के मामलों में यह देखा गया है कि प्राथमिक उपचार (First Aid) की सही जानकारी न होना और मरीज को अस्पताल ले जाने का गलत तरीका (जैसे बाइक पर बीच में बैठाकर ले जाना) उसकी हालत को और ज्यादा गंभीर बना देता है।

हार्ट अटैक के मामलों में भी शुरुआती कुछ मिनट जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर तय करते हैं, जहाँ समय पर दी गई सीपीआर (CPR) मरीज की डूबती सांसों को वापस ला सकती है। इसी तरह, ब्रेन स्ट्रोक आने पर मरीज को जितनी जल्दी न्यूरोलॉजिस्ट के पास पहुंचाया जाएगा, उसके दिमाग की कोशिकाओं को उतना ही कम नुकसान पहुंचेगा।

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भारतीय एंबुलेंस प्रणालियों में बड़ी खामी: गायब हैं ‘ट्रामा और सर्वाइकल बोर्ड’

गहन चिकित्सा विशेषज्ञों (Critical Care Specialists) ने देश की स्वास्थ्य प्रणाली की एक बड़ी कमी की ओर इशारा किया है। दुनिया के विकसित देशों में सड़क हादसों के मरीजों को सुरक्षित ले जाने के लिए हर एंबुलेंस में ‘ट्रामा बोर्ड’ और ‘सर्वाइकल बोर्ड’ अनिवार्य होते हैं, लेकिन भारत की अधिकांश एंबुलेंस में यह लाइफ-सेविंग टूल गायब हैं।

  • ट्रामा बोर्ड: यह एक मजबूत और पूरी तरह सपाट बोर्ड होता है, जिस पर घायल को सीधा लिटाया जाता है ताकि उसकी रीढ़ की हड्डी को और नुकसान न पहुंचे।

  • सर्वािकल बोर्ड: यह मरीज की गर्दन को एक जगह स्थिर (Lock) रखने का काम करता है ताकि परिवहन के दौरान झटका लगने से रीढ़ की नसें न दबें। डॉक्टरों ने सरकार से इसे तुरंत अनिवार्य करने की मांग की है।

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इमरजेंसी गाइड: दुर्घटना या हार्ट अटैक के समय क्या करें और क्या न करें?

ऐसी आपातकालीन स्थितियों में आम नागरिकों को ‘ट्रामा प्रोटोकॉल’ की बेसिक जानकारी होना बेहद जरूरी है, क्योंकि अस्पताल पहुंचने से पहले आपके द्वारा दी गई सही मदद ही किसी की जिंदगी बचा सकती है।

सड़क हादसे के वक्त बरतें ये सावधानियां:

  • दुर्घटना देखते ही सबसे पहले एंबुलेंस (108) और पुलिस को तत्काल सूचना दें।

  • यदि घायल व्यक्ति के सिर, गर्दन या पीठ पर चोट के लक्षण दिखें, तो उसे अपनी तरफ से ज्यादा न हिलाएं और न ही जबरन उठाने की कोशिश करें।

  • शरीर से खून बह रहा हो, तो साफ कपड़े या पट्टी से उस स्थान पर तेज दबाव बनाकर ब्लीडिंग रोकने का प्रयास करें।

  • सबसे जरूरी बात, घायल या बेहोश व्यक्ति के मुंह में पानी या कोई भी खाने की चीज जबरदस्ती न डालें, इससे सांस की नली चोक हो सकती है।

  • घायल को ऑटो या बाइक पर बैठाकर ले जाने के बजाय एंबुलेंस या किसी ऐसी बड़ी कार का इस्तेमाल करें जहाँ वह सीधा लेट सके।

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हार्ट अटैक आने पर तुरंत करें यह काम:

  • यदि किसी व्यक्ति के सीने में तेज दर्द या भारीपन हो, तो उसे तुरंत आरामदायक स्थिति में बैठाएं और शांत रखने की कोशिश करें।

  • यदि मरीज अचानक बेहोश हो जाए और उसकी नब्ज व सांस बंद हो जाए, तो बिना एक सेकंड गंवाए तुरंत सीपीआर (कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन) शुरू कर दें और एंबुलेंस का इंतजार करें।

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गहन चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. संजय धानुका और डॉ. निखिलेश जैन का कहना है कि इमरजेंसी में ‘ट्रामा प्रोटोकॉल’ का कड़ाई से पालन होना चाहिए, क्योंकि इसमें हुई जरा सी भी लापरवाही सीधे मौत का कारण बनती है। इसके साथ ही, डॉक्टरों ने एक और महत्वपूर्ण विषय पर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि केवल दुर्घटनास्थल ही नहीं, बल्कि अस्पताल पहुंचने के बाद जब परिजन आईसीयू (ICU) में प्रवेश करते हैं, तो उन्हें हाइजीन (स्वच्छता) का पूरा ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि आईसीयू में भर्ती गंभीर मरीजों को बाहरी संक्रमण का सबसे ज्यादा खतरा होता है।

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