‘ऐश वेडनेसडे’ यानी राख बुधवार से शुरू हुई यह 40 दिनों की आध्यात्मिक यात्रा ईस्टर संडे तक जारी रहेगी। इस विशेष अवधि को छोटा नागपुर, जशपुर और सरगुजा के आदिवासी अंचलों में स्थानीय परंपराओं के अनुसार ‘चालीसा’ के नाम से जाना जाता है, जहाँ मसीही विश्वासी प्रार्थना, उपवास और दान-पुण्य के माध्यम से ईश्वर के सामीप्य की ओर कदम बढ़ा रहे हैं।
इस काल की महत्ता इसी बात से समझी जा सकती है कि इसमें रविवार को उपवास की गिनती से मुक्त रखा गया है, क्योंकि प्रत्येक रविवार को प्रभु के पुनरुत्थान के उत्सव के रूप में देखा जाता है।
क्षेत्रीय बोलियों जैसे नागपुरी और कुड़ुख मिश्रित समाज में बुजुर्ग इसे ‘उपवास कर दिन’ या ‘रोजा के दिन’ के रूप में भी संबोधित करते हैं, जो इस पर्व की स्थानीय जड़ों की गहराई को दर्शाता है।
इस दौरान श्रद्धालुओं की जीवनशैली में एक विशिष्ट संयम देखने को मिलता है। उपवास केवल भोजन के त्याग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक ‘आध्यात्मिक उपवास’ है जिसमें लोग मांस-मदिरा, विलासिता और सोशल मीडिया जैसे आधुनिक आकर्षणों को त्यागकर अपना ध्यान प्रभु के ‘दुखभोग’ पर केंद्रित करते हैं।
चर्चों में ‘क्रूस का रास्ता’ जैसे भक्ति आयोजनों के माध्यम से यीशु के कष्टों के 14 पड़ावों पर मनन किया जाता है। जशपुर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में इसे ‘मन फिराव’ यानी पश्चाताप का समय माना जाता है, जहाँ उपवास से संचित किए गए धन को निर्धनों और बीमारों की सेवा में लगाकर आध्यात्मिक तृप्ति प्राप्त की जाती है।
इस पावन काल का श्रीगणेश राख बुधवार के प्रतीकात्मक अनुष्ठान से हुआ, जिसमें खजूर की राख से माथे पर क्रूस का चिन्ह बनाकर मनुष्य को उसकी नश्वरता का स्मरण कराया गया। ‘तू मिट्टी है और मिट्टी में मिल जाएगा’ का यह संदेश जीवन की क्षणभंगुरता और ईश्वर के प्रति समर्पण को रेखांकित करता है।
यह 40 दिनों का सफर अब ‘पवित्र सप्ताह’ की ओर बढ़ेगा, जिसमें खजूर रविवार से लेकर गुड फ्राइडे तक के विशेष अनुष्ठान होंगे और अंततः ईस्टर संडे के आनंदोत्सव के साथ इस आध्यात्मिक यात्रा का समापन होगा।
CG NOW एक भरोसेमंद और निष्पक्ष न्यूज़ प्लेटफॉर्म है, जो आपको छत्तीसगढ़, भारत और दुनिया भर की ताज़ा, सटीक और तथ्य-आधारित खबरें प्रदान करता है। हमारी प्राथमिकता है जनता तक सही और निष्पक्ष जानकारी पहुँचाना, ताकि वे हर पहलू से जागरूक और अपडेटेड रहें।