शत-प्रतिशत अनुदान प्राप्त अशासकीय महाविद्यालयों के सेवानिवृत्त प्राध्यापकों और पेंशनरों के लिए एक निराशाजनक खबर सामने आई है। उच्च शिक्षा विभाग ने पेंशन और ग्रेच्युटी के लाभ से जुड़े 14 साल पुराने आदेश को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया है। इसके साथ ही, हाल ही में मंजूर की गई 350 लाख रुपये (₹3.5 करोड़) की दूसरी किस्त का विमुक्ति आदेश भी रद्द कर दिया गया है।
12 अक्टूबर 2010 का आदेश निरस्त
राज्य शासन ने 12 अक्टूबर 2010 को जारी विभागीय आदेश को समाप्त कर दिया है। उस आदेश के तहत इन अशासकीय कॉलेजों के सेवानिवृत्त शिक्षकों को चौथे वेतनमान के आधार पर ग्रेच्युटी तथा पांचवें वेतनमान के आधार पर पेंशन और ग्रेच्युटी का वित्तीय लाभ दिया जा रहा था। 1 सितंबर 2026 को जारी आदेश के तहत इन सभी लाभों पर पूर्ण विराम लगा दिया गया है।
मंत्रिपरिषद की बैठक में लिया गया नीतिगत निर्णय
उच्च शिक्षा विभाग द्वारा जारी निर्देश के अनुसार: 22 जुलाई 2026 को आयोजित मंत्रिपरिषद की बैठक में इस विषय पर विस्तृत विचार-विमर्श हुआ। बैठक में यह निष्कर्ष निकाला गया कि सेवा नियमों में इसका स्पष्ट प्रावधान नहीं है और यह व्यवस्था लोकहित के अनुकूल नहीं है। इस आधार पर प्रस्ताव को अमान्य करते हुए सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) में लंबित प्रकरणों में उचित कानूनी पैरवी करने का परामर्श दिया गया।
बजट आवंटन आदेश भी वापस
नीतिगत बदलाव के प्रभाव से विभाग ने 8 सितंबर 2026 को जारी उस आदेश को भी वापस ले लिया है, जिसके माध्यम से पेंशनरों के लिए 1400 लाख रुपये (₹14 करोड़) के कुल बजटीय प्रावधान में से द्वितीय किस्त के रूप में 350 लाख रुपये जारी किए गए थे। 1 सितंबर के निरस्तीकरण आदेश के आधार पर 8 सितंबर के इस भुगतान आदेश को भी शून्य घोषित कर दिया गया है।
प्राध्यापक संघ ने जताई गंभीर चिंता
छत्तीसगढ़ राज्य अनुदान प्राप्त महाविद्यालयीन प्राध्यापक संघ ने शासन के इस फैसले पर कड़ा विरोध दर्ज कराया है।
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दवा और आजीविका का संकट: संघ के प्रांतीय अध्यक्ष डॉ. अजय कुमार शर्मा ने कहा कि पिछले 40 वर्षों से निरंतर चली आ रही व्यवस्था को अचानक समाप्त करने से सेवानिवृत्त शिक्षक गहरे आर्थिक संकट में फंस गए हैं।
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बुजुर्ग पेंशनरों की लाचारी: उन्होंने कहा कि 90 वर्ष से अधिक आयु के वयोवृद्ध शिक्षकों के लिए जीवनयापन, दैनिक खर्च और चिकित्सा सुविधाएं जुटाना बेहद कठिन हो जाएगा। साथ ही, वर्तमान में सेवारत प्राध्यापकों के भविष्य पर भी इसका गहरा विपरीत प्रभाव पड़ेगा।



