बाल सुरक्षा पर सरकार का कड़ा रुख: 18 वर्ष से कम आयु में ‘सहमति’ का कोई स्थान नहीं
नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने आज लोकसभा में महिला सुरक्षा, बाल संरक्षण और दिव्यांगजनों के अधिकारों को लेकर एक ऐसी व्यापक योजना पेश की है, जो कानून की कड़ाई के साथ-साथ मानवीय संवेदनशीलता को भी दर्शाती है। केंद्रीय मंत्रियों द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, भारत अब एक ऐसी व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है जहाँ न्याय और सुरक्षा समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के लिए भी सुलभ होगी।
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कठोर कानून और अपराध मुक्त समाज का संकल्प
इस पूरी व्यवस्था की शुरुआत अपराधों पर कड़े प्रहार से होती है। भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 के लागू होने के बाद अब मानव तस्करी कोई सामान्य अपराध नहीं, बल्कि एक ‘संगठित अपराध’ बन गया है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि महिलाओं और बच्चों की तस्करी करने वालों के लिए कानून में अब कोई नरमी नहीं होगी। इसके साथ ही, पोक्सो (POCSO) अधिनियम के तहत यह कड़ा संदेश दिया गया है कि 18 वर्ष से कम उम्र के साथ किसी भी प्रकार का यौन कृत्य अपराध ही रहेगा; इसमें ‘सहमति’ के किसी भी तर्क को स्वीकार नहीं किया जाएगा, क्योंकि नाबालिग ऐसे निर्णयों के परिणामों को समझने में सक्षम नहीं होते।
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पुनर्वास और स्वास्थ्य की दोहरी ढाल
कानून की सख्ती के साथ-साथ पीड़ितों को समाज की मुख्यधारा में लौटाने के लिए ‘मिशन शक्ति’ के तहत ‘शक्ति सदन’ चलाए जा रहे हैं, जो बेसहारा महिलाओं को आश्रय और प्रशिक्षण प्रदान कर रहे हैं। स्वास्थ्य के मोर्चे पर ‘आयुष्मान भारत’ और जन औषधि केंद्रों ने क्रांति ला दी है, जहाँ महिलाओं को मुफ्त इलाज और मात्र 1 रुपये में सैनिटरी पैड उपलब्ध कराकर उनके स्वास्थ्य अधिकारों को सुरक्षित किया जा रहा है।
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सामाजिक बदलाव और लिंगानुपात में बड़ी जीत
इन कानूनी प्रयासों का सबसे बड़ा प्रभाव समाज की सोच पर पड़ा है। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना अब एक सरकारी नीति से बढ़कर एक ‘राष्ट्रीय आंदोलन’ बन चुकी है। इसी का परिणाम है कि राष्ट्रीय स्तर पर जन्म के समय लिंगानुपात 918 से बढ़कर 929 तक पहुँच गया है और सेकेंडरी स्कूलों में लड़कियों का नामांकन भी 80 प्रतिशत के पार निकल गया है। यह आंकड़े गवाही देते हैं कि देश की बेटियां अब सुरक्षित माहौल में आगे बढ़ रही हैं।
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अब दिव्यांगजनों के द्वार तक कानूनी मदद
व्यवस्था की यह सुरक्षा अब दिव्यांगजनों तक भी विस्तार पा चुकी है। एनएएलएसए (NALSA) 2024 योजना के तहत ‘मनोन्याय’ जैसी इकाइयां गठित की गई हैं, जो मानसिक और बौद्धिक रूप से अक्षम व्यक्तियों को कानूनी सहायता दे रही हैं। सरकार ने अदालतों के बुनियादी ढांचे को भी पूरी तरह ‘दिव्यांग-अनुकूल’ बना दिया है। डिजिटल क्षेत्र में भी 750 से अधिक कोर्ट वेबसाइट्स को दृष्टिबाधित लोगों के लिए सुलभ बनाया गया है, जिससे न्याय पाना अब शारीरिक बाधाओं पर निर्भर नहीं रहा।
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अंत्योदय से न्यायोदय तक
प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत मुफ्त राशन और जन धन योजना के जरिए सीधा लाभ पहुँचाकर सरकार ने उस आर्थिक लाचारी को खत्म करने की कोशिश की है, जो अक्सर शोषण का कारण बनती है। झारखंड के जनजातीय इलाकों से लेकर जम्मू-कश्मीर के पहाड़ों तक, मोबाइल कानूनी वैन और डोर-टू-डोर अभियान यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि न्याय का सूरज देश के हर कोने में समान रूप से चमके।

