छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने दुष्कर्म के एक गंभीर मामले की सुनवाई के दौरान पुलिस व्यवस्था और पीड़ित पक्ष के शक्ति संतुलन को लेकर बेहद सख्त और महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि पुलिस अधिकारी के पास राज्य की ओर से प्रदत्त संस्थागत शक्ति (इन्स्टिट्यूशनल पावर) होती है और वह हमेशा समाज में वर्चस्व व प्रभाव की स्थिति में रहता है। ऐसी परिस्थिति में किसी पीड़िता की सहमति को सामान्य अर्थों में ‘स्वतंत्र सहमति’ (Free Consent) नहीं माना जा सकता, क्योंकि वह कानूनी कार्रवाई के खौफ या पुलिसिया दबाव के कारण भी संबंध बनाने के लिए विवश हो सकती है। इस सख्त रुख के साथ जस्टिस राकेश मोहन पांडेय की एकलपीठ ने आदिवासी विधवा महिला से दुष्कर्म के आरोपित पुलिस आरक्षक रूद्रमणी यादव की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया।
जशपुर के कांसाबेल थाने का है मामला
यह पूरा मामला जशपुर जिले के कांसाबेल थाना क्षेत्र से जुड़ा हुआ है: तंगरडीह (जशपुर) निवासी आरक्षक रूद्रमणी यादव पर एक आदिवासी विधवा महिला का दैहिक शोषण करने और उत्पीड़न का गंभीर आरोप है।आरोपित आरक्षक के खिलाफ कांसाबेल थाने में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376(2)(एन) (बार-बार दुष्कर्म करना) और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(2)(वी) के तहत गैर-जमानती अपराध दर्ज है।
विशेष अदालत के फैसले को हाई कोर्ट में दी थी चुनौती
इससे पहले विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी एक्ट) जशपुर ने 30 अप्रैल 2026 को आरक्षक रूद्रमणी यादव की अग्रिम जमानत अर्जी खारिज कर दी थी। निचली अदालत के इस आदेश के खिलाफ आरोपित ने एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम की धारा 14-ए(2) के तहत हाई कोर्ट में आपराधिक अपील दायर कर राहत की गुहार लगाई थी। सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष की ओर से सहमति से संबंध होने का तर्क रखने का प्रयास किया गया, जिसे हाई कोर्ट ने सिरे से नकार दिया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि एक आम नागरिक और वर्दीधारी पुलिसकर्मी के बीच शक्ति का स्तर समान नहीं होता। पुलिस की धौंस और कानूनी शिकंजे के भय से दी गई मौन सहमति कानूनन वैध सहमति के दायरे में नहीं आती।अग्रिम जमानत याचिका खारिज होने के बाद अब आरोपित आरक्षक पर गिरफ्तारी की तलवार लटक गई है। जशपुर के इस बहुचर्चित मामले में हाई कोर्ट के इस आदेश को पुलिस जवाबदेही और वंचित वर्ग के संरक्षण की दिशा में एक नजीर माना जा रहा है।


