जशपुर। छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में इन दिनों मौसम का एक ऐसा रूप देखने को मिल रहा है जिसने विज्ञान और आम आदमी के तर्क, दोनों को पीछे छोड़ दिया है।
कैलेंडर के हिसाब से जहाँ अब सूरज की तपिश और गर्मी का अहसास होना चाहिए था, वहीं जशपुर की फिजाओं में इस वक्त सावन और विंटर का एक अजीब मिश्रण घुला हुआ है।
पिछले दो दिनों से हो रही आंधी-बारिश ने ऐसा माहौल बना दिया है कि लोग यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि वे आखिर किस मौसम में जी रहे हैं।
कल शाम से शुरू हुई बारिश ने देखते ही देखते सावन की झड़ी जैसा रूप अख्तियार कर लिया और पूरी रात बिना रुके पानी बरसता रहा। इस बेमौसम बरसात का असर सीधा तापमान पर पड़ा और पारा इतनी तेजी से लुढ़का कि लोगों को शाम ढलते ही कंपकंपी का अहसास होने लगा।
आलम यह था कि सड़कों पर चलने वाले लोग अचानक जैकेट पहने नजर आने लगे। जिन गरम कपड़ों, कंबलों और रजाइयों को गर्मी की आहट देखते ही लोगों ने धो-धाकर अलमारियों और संदूकों में सहेज दिया था, उन्हें दोबारा बाहर निकालने की नौबत आ गई है।
जशपुर के बाज़ारों और मोहल्लों में इस वक्त सबसे बड़ी चर्चा मौसम के इस ‘महा-कन्फ्यूजन’ की ही है। दो दिन पहले की चिलचिलाती धूप और उमस अब बीते वक्त की बात लग रही है। अचानक बढ़ी इस ठंड ने मार्च के महीने में जनवरी की याद दिला दी है।
लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि यह गर्मी की शुरुआत है, मानसून की दस्तक है या फिर सर्दियों की वापसी। कुदरत के इस अनपेक्षित मिजाज ने न केवल आम जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है, बल्कि लोगों को सेहत के प्रति भी भारी असमंजस में डाल दिया है।
जशपुर की समुद्र तल से औसत ऊंचाई लगभग 750 से 1000 मीटर (करीब 2500 से 3300 फीट) है, जिसके कारण यहाँ का तापमान मैदानी इलाकों की तुलना में पहले से ही कम रहता है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, वर्तमान में एक शक्तिशाली ‘पश्चिमी विक्षोभ’ (Western Disturbance) सक्रिय है, जिसकी ट्रफ लाइन उत्तर भारत से लेकर छत्तीसगढ़ के उत्तरी हिस्से तक फैली हुई है।
इसके साथ ही बंगाल की खाड़ी से आ रही नमी वाली हवाओं ने जशपुर के ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों (पाट प्रदेशों) में टकराकर सघन बादल बनाए हैं। मौसम विभाग का कहना है कि इसी सिस्टम के कारण मार्च में भी जनवरी जैसी स्थिति बन गई है और ऊंचाई पर स्थित होने की वजह से जशपुर में ठंडी हवाओं का असर मैदानी जिलों के मुकाबले कहीं ज्यादा महसूस किया जा रहा है।
सितम यह है कि जशपुर के बुजुर्गों और मौसम के जानकारों के मुताबिक, मार्च के महीने में इस तरह की ‘सावन वाली झड़ी’ और कड़ाके की ठंड का लौटना बहुत दुर्लभ है। हालांकि जशपुर अपनी ऊंचाई और घने जंगलों के कारण छत्तीसगढ़ का सबसे ठंडा इलाका माना जाता है, जहाँ अक्सर हल्की बूंदाबांदी से मौसम सुहावना हो जाता है, लेकिन इस बार की स्थिति बिल्कुल अलग है।
जानकारों का कहना है कि बीते 10-15 सालों में इक्का-दुक्का बार ही ऐसा हुआ है जब लोगों को मार्च के अंत में दोबारा जैकेट और भारी कंबल निकालने की जरूरत पड़ी हो। आमतौर पर इस समय तक महुआ बीनने का सीजन शुरू हो जाता है और हल्की गर्मी का अहसास होने लगता है, लेकिन इस साल कुदरत के इस बदले मिजाज ने पुराने सारे रिकॉर्ड धुंधले कर दिए हैं। स्थानीय लोग इसे ‘क्लाइमेट चेंज’ का असर मान रहे हैं, क्योंकि इतनी लंबी झड़ी और फिर जनवरी जैसी ठिठुरन इस महीने में पहले कभी इतनी शिद्दत से महसूस नहीं की गई थी।
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कुल मिलाकर, जशपुर में मौसम का यह मिजाज किसी पहेली से कम नहीं है। ऊँचाई पर स्थित होने के कारण यहाँ की तासीर हमेशा से ठंडी रही है, लेकिन मार्च के महीने में सावन जैसी झड़ी और दिसंबर जैसी कड़कड़ाती ठंड का यह मेल बीते कई दशकों में बिरला ही देखने को मिला है।
कुदरत के इस ‘कन्फ्यूजन’ ने इंसान की बनाई ऋतुओं की सीमाओं को धुंधला कर दिया है। फिलहाल, जशपुरवासी गीले कपड़ों और अचानक निकली जैकेटों के बीच इस अनोखे मौसम को जी रहे हैं, लेकिन यह बदलाव आने वाले दिनों में खेती और स्वास्थ्य पर क्या असर डालेगा, यह आने वाला वक्त ही बताएगा। तब तक के लिए, जशपुर की वादियों में कंबल और बारिश की बूंदों का यह बेमौसम साथ जारी है।

