नई दिल्ली: भारत में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव अब पहले से कहीं अधिक गंभीर होते जा रहे हैं। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की हालिया रिपोर्ट ‘भारतीय क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन का आकलन’ के अनुसार, वर्ष 1901 से 2018 के बीच देश के औसत तापमान में 0.7 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की गई है। यह बढ़ता तापमान न केवल गर्मी बढ़ा रहा है, बल्कि इसके कारण भारी वर्षा की घटनाओं में भी 75 प्रतिशत तक का इजाफा हुआ है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि समुद्र के स्तर में भी चिंताजनक बढ़ोतरी देखी गई है, जो पिछले ढाई दशकों में 3.3 मिमी प्रति वर्ष की दर से बढ़ रहा है। विशेष रूप से हिमालयी क्षेत्रों में तापमान बढ़ने से ग्लेशियरों के पिघलने की गति तेज हुई है, जबकि देश के कई हिस्सों में सूखे का भौगोलिक विस्तार भी बढ़ गया है।
इन चरम मौसम की घटनाओं और प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए सरकार ने अपनी तकनीकी क्षमता में क्रांतिकारी बदलाव किए हैं। वर्तमान में भारत ने अपनी सुपरकंप्यूटिंग क्षमता को बढ़ाकर 28 पेटाफ्लॉप्स तक पहुँचा दिया है, जो 2014 की तुलना में चार गुना अधिक है। पुणे और नोएडा में स्थापित ‘अरुणिका’ और ‘अर्का’ जैसे उन्नत सुपरकंप्यूटिंग सिस्टम अब मौसम की भविष्यवाणी को बेहद सटीक बना रहे हैं। मई 2025 में चालू की गई ‘भारत पूर्वानुमान प्रणाली’ (BharatFS) के माध्यम से अब केवल जिला स्तर पर ही नहीं, बल्कि ब्लॉक और पंचायत स्तर तक 6 किलोमीटर के उच्च रिज़ॉल्यूशन पर सटीक मौसम की जानकारी प्रदान की जा रही है।
तकनीक में इस सुधार का सबसे बड़ा लाभ चक्रवात और लू (Heatwave) के सटीक पूर्वानुमान में देखने को मिल रहा है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने चक्रवात के तट से टकराने के सटीक बिंदु की भविष्यवाणी में होने वाली त्रुटियों को 35 से 45 प्रतिशत तक कम कर दिया है। अब लू की चेतावनी भी 4-5 दिन पहले ही जारी कर दी जाती है, जिससे स्थानीय प्रशासन को आपदा प्रबंधन के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है। सरकार अब ‘मिशन मौसम’ के दूसरे चरण की तैयारी कर रही है, जिसके तहत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और मशीन लर्निंग को पूर्वानुमान प्रणालियों में जोड़ा जाएगा। इन प्रयासों का सीधा उद्देश्य कृषि, मत्स्य पालन और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में जान-माल के नुकसान को न्यूनतम करना और नागरिकों की आजीविका को सुरक्षित बनाना है।


