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रायपुर: छत्तीसगढ़ सरकार ने राज्य के शासकीय सेवकों और कर्मचारियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामलों में अभियोजन स्वीकृति (Prosecution Sanction) देने की प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी, सख्त एवं समयबद्ध बना दिया है। राज्य शासन के सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) द्वारा जारी नए निर्देशों के अनुसार, अब सरकारी विभागों को तय समय-सीमा के भीतर भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों का निपटारा करना अनिवार्य होगा। इस संबंध में शासन के सभी विभागों, विभागाध्यक्षों और संभागीय अधिकारियों को कड़े निर्देश जारी कर दिए गए हैं, ताकि भ्रष्टाचार के मामलों में फाइलों को बेवजह दबाकर न रखा जा सके।

45 दिनों में देनी होगी मंजूरी, असहमति पर विधि विभाग लेगा अंतिम फैसला

नए नियमों के तहत, यदि नियुक्तिकर्ता प्राधिकारी को प्राथमिक जांच के बाद लगता है कि मामला अभियोजन योग्य है, तो उसे आवेदन मिलने की तारीख से 45 दिनों के भीतर अभियोजन की स्वीकृति जारी करनी होगी।

यदि प्राधिकारी मामले में अभियोजन की स्वीकृति देने से असहमत है, तो वह मामले को सीधे खारिज नहीं कर पाएगा। ऐसी स्थिति में प्राधिकारी को अपनी असहमति के ठोस और स्पष्ट कारणों के साथ पूरी फाइल विधि विभाग (Law Department) को भेजनी होगी। शासन ने स्पष्ट किया है कि जांच, असहमति और अंतिम निर्णय की इन सभी प्रक्रियाओं को अधिकतम 3 महीने (90 दिन) की अनिवार्य समय-सीमा के भीतर पूरा करना ही होगा।

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अखिल भारतीय सेवा के अफसरों के लिए विशेष प्रक्रिया

भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS), पुलिस सेवा (IPS) और वन सेवा (IFS) जैसी अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों के मामलों के लिए एक विशेष प्रक्रिया तय की गई है। इन मामलों में विधि विभाग सबसे पहले संबंधित प्रशासकीय विभाग के अभिमत का गहन परीक्षण करेगा। इसके बाद समन्वय (Coordination) के माध्यम से उच्च स्तर से आवश्यक आदेश प्राप्त कर आगे की कार्यवाही सुनिश्चित की जाएगी।

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आउटसोर्स और मानदेय कर्मियों के लिए बड़ी छूट, सीधे होगी कार्रवाई

सरकार ने इस नए आदेश में आउटसोर्स (Outsourced) कर्मचारियों और मानदेय (Honorarium) पर काम करने वाले कर्मियों को लेकर भी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट कर दी है। चूंकि राज्य सरकार या कोई सरकारी निकाय इन कर्मचारियों का सीधे ‘नियुक्तिकर्ता प्राधिकारी’ नहीं होता है, इसलिए इन श्रेणियों के कर्मियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामलों में किसी भी प्रकार की औपचारिक अभियोजन स्वीकृति की आवश्यकता नहीं होगी। जांच एजेंसियां ऐसे मामलों में सीधे अभियोजन की कार्यवाही शुरू कर सकेंगी।

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अदालतों के चक्करों से मिलेगी मुक्ति, बार-बार गवाही की जरूरत नहीं

नए नियमों के तहत जांच एजेंसियों और अधिकारियों को एक और बड़ी राहत दी गई है। अब अभियोजन स्वीकृति के आदेशों को ‘लोक दस्तावेज’ (Public Document) माना जाएगा। इसका सीधा मतलब यह है कि अदालत में इस आदेश को प्रमाणित करने के लिए संबंधित जारीकर्ता अधिकारी को बार-बार साक्ष्य या गवाही देने के लिए व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने की आवश्यकता नहीं होगी।

हालांकि, यदि आरोपी कर्मचारी अदालत में इस आदेश की वैधानिकता या अधिकारी की सक्षमता को चुनौती देता है, तो न्यायालय कानून के प्रावधानों के तहत ही संबंधित अधिकारी को तलब कर सकेगा। सरकार के इस कदम से भ्रष्टाचार के मामलों की अदालती सुनवाई में तेजी आने की उम्मीद है।

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