एआई की शक्ति से सुरक्षित होता भारत: नई दिल्ली में ‘इंडिया-एआई इम्पैक्ट समिट 2026’ का ऐतिहासिक आगाज़
नई दिल्ली | 16 फरवरी, 2026
भारत में नकदी के युग का अंत और डिजिटल युग का उदय अब महज़ एक सपना नहीं, बल्कि एक ठोस हकीकत बन चुका है। नई दिल्ली में आयोजित ‘चिंतन शिविर-2026’ के मंच से वित्त मंत्रालय ने एक ऐसी रिपोर्ट जारी की है, जो भारत की बदलती आर्थिक तकदीर की गवाही दे रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार द्वारा रुपे (RuPay) डेबिट कार्ड और भीम-यूपीआई को दिए गए प्रोत्साहनों ने देश में डिजिटल भुगतान की ऐसी लहर पैदा की है, जिसने पिछले चार वर्षों में लेन-देन के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं।
आंकड़ों की जुबानी: डिजिटल इंडिया की उड़ान
इस रिपोर्ट का सबसे प्रभावशाली पहलू डिजिटल लेन-देन में हुई 11 गुना की अभूतपूर्व वृद्धि है। 2021 से 2025 के बीच भारत ने एक ऐसा सफर तय किया है जहाँ आज कुल डिजिटल लेन-देन में अकेले यूपीआई (UPI) की हिस्सेदारी 80 प्रतिशत पहुँच गई है। यह आंकड़ा साबित करता है कि अब भारतीय नागरिकों के लिए बटुआ (Wallet) से ज्यादा जरूरी मोबाइल ऐप हो गया है। सर्वे के अनुसार, देश के 57 प्रतिशत लोग अब नकद के बजाय यूपीआई को ही प्राथमिकता देते हैं।
गाँव की दुकान से लेकर महानगरों तक ‘क्यूआर’ का जाल
डिजिटल भुगतान की यह चमक केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं रही। रिपोर्ट बताती है कि यूपीआई क्यूआर कोड की संख्या 9.3 करोड़ से उछलकर 65.8 करोड़ के पार पहुँच गई है। आज देश के 94 प्रतिशत छोटे व्यापारियों के पास यूपीआई की सुविधा मौजूद है। दिलचस्प बात यह है कि 57 प्रतिशत व्यापारियों ने माना है कि डिजिटल पेमेंट अपनाने के बाद न केवल उनका रिकॉर्ड मैनेजमेंट बेहतर हुआ है, बल्कि उनकी बिक्री में भी भारी इजाफा हुआ है।
सरकारी प्रोत्साहन: ₹8,276 करोड़ का मजबूत आधार
इस सफलता के पीछे सरकार की सुविचारित प्रोत्साहन योजना का बड़ा हाथ है। वित्त वर्ष 2021 से 2025 के बीच सरकार ने 8,276 करोड़ रुपये की बजटीय सहायता प्रदान की। इस राशि ने बैंकों और फिनटेक कंपनियों को वह बुनियादी ढांचा तैयार करने में मदद की, जिससे डिजिटल भुगतान नागरिकों के लिए मुफ्त, सुलभ और सुरक्षित बना रहा। इसी का परिणाम है कि यूपीआई प्लेटफॉर्म से जुड़े बैंकों की संख्या 216 से बढ़कर 661 हो गई है।
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बदलती आदतें: एटीएम से बढ़ी दूरी
रिपोर्ट में एक गहरा सामाजिक-आर्थिक बदलाव भी दर्ज किया गया है। जैसे-जैसे यूपीआई और रुपे कार्ड पर भरोसा बढ़ा (जो अब 90 प्रतिशत उपयोगकर्ताओं में है), लोगों ने एटीएम से पैसे निकालना कम कर दिया है। छोटे मूल्य के नोटों की मांग में गिरावट आई है, जो इस बात का संकेत है कि अब ‘चाय की टपरी’ से लेकर ‘किराना स्टोर’ तक, भारत डिजिटल रूप से आत्मनिर्भर हो रहा है। विशेषकर 18-25 आयु वर्ग के 66 प्रतिशत युवा अब पूरी तरह ‘डिजिटल-फर्स्ट’ वित्तीय आदतों को अपना चुके हैं।
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भविष्य का मार्ग: ग्रामीण भारत पर फोकस
सफलता के इस शिखर पर पहुँचने के बाद अब सरकार की नज़र अगले लक्ष्य पर है। रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि अब ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में रुपे डेबिट कार्ड के उपयोग को और मज़बूत किया जाए। साथ ही, ‘यूपीआई लाइट’ जैसे समाधानों के ज़रिए छोटे लेन-देन को और भी आसान बनाने और डिजिटल धोखाधड़ी के खिलाफ सुरक्षा को और पुख्ता करने पर ज़ोर दिया जाएगा।
नतीजा साफ़ है: भारत अब एक ऐसी पारदर्शी और औपचारिक अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ चुका है, जहाँ तकनीक समावेशी विकास का सबसे बड़ा औज़ार बन गई है। वित्त मंत्रालय की यह रिपोर्ट केवल एक विश्लेषण नहीं, बल्कि विकसित भारत की ओर बढ़ते मज़बूत कदमों की आहट है।
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