विशेष रिपोर्ट ( विपिन सिंह/उद्दालक नायडू)
जशपुर। 12 अगस्त को मनाए जा रहे ‘विश्व हाथी दिवस’ (World Elephant Day) पर मध्य भारत में हाथियों के संरक्षण और उनके प्राकृतिक रास्तों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और ज़मीनी तस्वीर सामने आई है। छत्तीसगढ़ का जशपुर ज़िला केवल एक सीमावर्ती इलाका नहीं रहा, बल्कि यह ओडिशा, झारखंड, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के बीच हाथियों की निर्बाध आवाजाही का सबसे बड़ा ‘सेंट्रल गेटवे’ बन चुका है। जशपुर के वनांचल में हाथियों का एक व्यापक आवागमन चक्र सक्रिय है, जहाँ ओडिशा से आने वाले हाथियों के दल जशपुर के रास्ते रायगढ़, कोरबा और सरगुजा संभाग तक अपनी लगातार मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं।
जशपुर का ‘पादप क्षेत्र’ और यहाँ मौजूद घने बाँस व नदियों के क्षेत्र हाथियों के पसंदीदा प्राकृतिक ठिकाने हैं, जहाँ से हाथियों का दल प्रमुख रूप से तीन दिशाओं में आवाजाही करता है। पहली दिशा ओडिशा बॉर्डर से जुड़ती है, जहाँ सुंदरगढ़ और मयूरभंज के जंगलों से निकलकर हाथियों के झुंड जशपुर में प्रवेश करते हैं। यह मार्ग दशकों से हाथियों का पारंपरिक ‘माइग्रेशन रूट’ रहा है। इसके बाद जशपुर के जंगलों में डेरा जमाने के बाद हाथियों का दल रायगढ़ के धर्मजयगढ़ व तमनार के वनांचल से होते हुए कोरबा जिले के कटघोरा और लेमरू वन परिक्षेत्र तक लगातार आता-जाता रहता है। इसके साथ ही जशपुर से दूसरा मुख्य रास्ता बलरामपुर, सरगुजा (मैनपाट व तमोर पिंगला अभयारण्य) की ओर जाता है, जहाँ से आगे बढ़कर हाथी मध्य प्रदेश के संजय-डुबरी और बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व तक का लंबा और सुरक्षित सफर तय करते हैं।
विज्ञान हाथियों को केवल एक वन्यजीव नहीं, बल्कि ‘क्लाइमेट हीरो’ और ‘इकोसिस्टम इंजीनियर’ मानता है। जशपुर और आसपास के जंगलों में घूमता एक अकेला वन हाथी अपने जीवनकाल में लगभग 250 एकड़ जंगल की कार्बन कैप्चर क्षमता को बढ़ा देता है। इसके अलावा, 18 से 22 महीने के लंबे गर्भकाल के बाद जब हाथी अपने बच्चों के साथ लंबी दूरी तय करते हैं, तो अपने मल के माध्यम से बड़े पेड़ों के बीजों को दूर-दूर तक फैलाते हैं, जिससे वनांचल का प्राकृतिक विस्तार होता है। यात्रा के दौरान हाथी छोटे पौधों को खाकर या उखाड़कर बड़े ‘साल’ और ‘सागौन’ के पेड़ों के लिए पर्याप्त धूप और बढ़ने की जगह भी तैयार करते हैं।
जशपुर, रायगढ़ और कोरबा जैसे घनी आबादी व कृषि बहुल इलाकों में ‘मानव-हाथी संघर्ष’ की चुनौतियों से निपटने के लिए वन विभाग द्वारा कई आधुनिक और पारंपरिक सुरक्षा उपाय अपनाए जा रहे हैं। हाथियों के मुख्य झुंड की लोकेशन ट्रैक करने के लिए दलपतियों को रेडियो कॉलर पहनाया गया है और GPS से निगरानी रखी जा रही है। वहीं, स्थानीय युवाओं का ‘हाथी मित्र दल’ हाथियों की मौजूदगी मिलते ही ग्रामीणों को व्हाट्सएप ग्रुप और लाउडस्पीकर के जरिए समय पर अलर्ट करता है। इसके साथ ही, खेतों के किनारों पर मिर्च की बाड़ (Chili Fences) और मधुमक्खियों के छत्तों का प्रयोग किया जा रहा है, जिससे हाथी फसलों और बस्तियों से दूर रहें। जशपुर ज़िला आज न केवल ओडिशा, सरगुजा, रायगढ़ और कोरबा के बीच ‘क्लाइमेट हीरो’ कहे जाने वाले हाथियों को एक सुरक्षित राह दे रहा है, बल्कि मध्य भारत के इस विशाल ‘एलिफेंट नेटवर्क’ की सबसे मजबूत रीढ़ बनकर उभरा है।

