सोनीपत: जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर अपनों की एक झलक पाने की चाह शायद सबसे बड़ी इच्छा होती है। लेकिन जब अपने पास न हों तो यह इंतजार बेहद दर्दनाक बन जाता है। सोनीपत के एक वृद्धाश्रम में रहने वाले पूर्व कपड़ा कारोबारी शिवचरण रामरतन गुप्ता की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। उन्होंने अपनी तीनों बेटियों को पढ़ाया-लिखाया और अपने पैरों पर खड़ा किया, लेकिन अंतिम समय में बेटियों से मुलाकात नहीं हो सकी। जिस मोबाइल फोन से वह बेटियों के फोन का इंतजार करते थे, उसी मोबाइल की स्क्रीन पर उनकी बेटियों ने अंतिम विदाई दी। इसके बाद नेत्रदान ने उनकी कहानी को एक नई उम्मीद से जोड़ दिया।
सिरहाने रखा रहता था मोबाइल, हर कॉल में बेटियों की उम्मीद
शिवचरण अपनी पत्नी के साथ सोनीपत के एक वृद्धाश्रम में रहने आए थे। पत्नी के निधन के बाद वह काफी अकेले हो गए। उम्र और बीमारी बढ़ने के बावजूद उन्हें हमेशा अपनी बेटियों के फोन का इंतजार रहता था। आश्रम प्रबंधन के अनुसार, मोबाइल अक्सर उनके सिरहाने रखा रहता था और फोन बजते ही उन्हें बेटियों की आवाज सुनने की उम्मीद होती थी।
बताया गया कि उनकी तीन बेटियां हैं। बड़ी बेटी नेपाल में शिक्षिका हैं, दूसरी उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में शिक्षिका हैं, जबकि तीसरी बेटी मुंबई में अपने परिवार के साथ रहती हैं। पिता की तबीयत बिगड़ने पर आश्रम की ओर से बेटियों को सूचना दी गई, लेकिन परिस्थितियों के चलते वे समय पर पहुंच नहीं सकीं।
चिता के सामने मोबाइल स्क्रीन पर हुई अंतिम विदाई
मंगलवार तड़के शिवचरण ने अंतिम सांस ली। इसके बाद उनके अंतिम संस्कार की तैयारी की गई। श्मशान घाट पर मौजूद लोगों के लिए यह बेहद भावुक पल था। एक ओर पिता की चिता तैयार थी और दूसरी ओर बेटियां वीडियो कॉल के जरिए मोबाइल स्क्रीन पर अपने पिता को अंतिम विदाई दे रही थीं।
बड़ी बेटी ने अंतिम संस्कार के लिए ₹5,100 ऑनलाइन भेजे और पिता की अस्थियों को गंगा में विसर्जित करने का अनुरोध किया। यह दृश्य वहां मौजूद लोगों के लिए बेहद भावुक कर देने वाला था।
मृत्यु के बाद नेत्रदान, दो जिंदगियों को मिलेगी रोशनी
शिवचरण गुप्ता की कहानी का सबसे प्रेरणादायक पहलू उनका नेत्रदान है। परिवार की सहमति और उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार मृत्यु के बाद उनकी आंखें दान की गईं। यानी जिन आंखों ने जीवनभर अपनों का इंतजार किया, वही अब किसी जरूरतमंद की दुनिया रोशन करने में मदद करेंगी।
यह घटना बुजुर्गों के अकेलेपन और परिवार से भावनात्मक जुड़ाव की अहमियत पर भी सवाल खड़े करती है। साथ ही नेत्रदान के जरिए शिवचरण गुप्ता ने समाज को एक ऐसी मिसाल दी, जिसे लंबे समय तक याद रखा जाएगा।
शिवचरण की कहानी दर्द के साथ-साथ मानवता और नेत्रदान की ताकत का संदेश देती है। उनका इंतजार भले ही अधूरा रह गया, लेकिन उनकी आंखें अब किसी और की जिंदगी में उजाला ला सकती हैं। ताज़ा खबरों और अपडेट्स के लिए हमें Facebook और Instagram पर फॉलो करें।

