बाल लिंग अनुपात की चुनौतियों से निपटने और लड़कियों के सशक्तिकरण के उद्देश्य से 22 जनवरी 2015 को शुरू की गई ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ योजना आज एक व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन का रूप ले चुकी है। इस पहल ने सरकारी एजेंसियों, मीडिया और नागरिक समाज को एक साथ लाकर लैंगिक भेदभाव के खिलाफ एक जन-भागीदारी सुनिश्चित की है। नीति आयोग द्वारा वित्तीय वर्ष 2019 से 2024 के बीच किए गए तीसरे पक्ष के मूल्यांकन में भी इस योजना को अत्यंत प्रासंगिक पाया गया है। मूल्यांकन रिपोर्ट के अनुसार, ‘मिशन शक्ति’ की उप-योजना ‘संबल’ के माध्यम से यह कार्यक्रम डेटा-आधारित सेवाओं का उपयोग कर लैंगिक चुनौतियों का प्रभावी ढंग से समाधान कर रहा है।
योजना के सकारात्मक प्रभाव सरकारी आंकड़ों में भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रीय स्तर पर जन्म के समय लिंग अनुपात, जो वर्ष 2014-15 में 918 था, वह वर्ष 2024-25 में बढ़कर 929 हो गया है। यह सुधार समाज की बदलती मानसिकता और कन्या भ्रूण हत्या जैसी कुरीतियों के खिलाफ बढ़ती जागरूकता को दर्शाता है।
इसी तरह, शिक्षा के क्षेत्र में भी लड़कियों ने लंबी छलांग लगाई है। शिक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, माध्यमिक स्तर पर विद्यालयों में लड़कियों का सकल नामांकन अनुपात वर्ष 2014-15 के 75.51 प्रतिशत से बढ़कर अब 80.2 प्रतिशत तक पहुँच गया है। केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती अन्नपूर्णा देवी ने इन महत्वपूर्ण उपलब्धियों की जानकारी राज्यसभा में देते हुए स्पष्ट किया कि सरकार की ये नीतियां न केवल लड़कियों की उत्तरजीविता सुनिश्चित कर रही हैं, बल्कि उन्हें शिक्षा के माध्यम से आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी सफल सिद्ध हो रही हैं।
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