नई दिल्ली: भारत में बढ़ते डिजिटल लेन-देन के साथ साइबर अपराधों की चुनौती से निपटने के लिए गृह मंत्रालय के तहत कार्यरत भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) एक बेहद प्रभावी इकोसिस्टम के रूप में उभरा है। सरकार ने साल 2018 में जिस योजना की नींव रखी थी, उसे 1 जुलाई, 2024 से गृह मंत्रालय के एक संबद्ध कार्यालय के रूप में और अधिक सशक्त बना दिया गया है। यह केंद्र न केवल राज्यों की पुलिस और केंद्रीय एजेंसियों के बीच समन्वय का काम कर रहा है, बल्कि आम नागरिकों को वित्तीय धोखाधड़ी से बचाने के लिए तकनीकी ढाल भी प्रदान कर रहा है।
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साइबर ठगी की स्थिति में नागरिकों की तुरंत मदद के लिए I4C ने ‘नागरिक वित्तीय साइबर धोखाधड़ी रिपोर्टिंग और प्रबंधन प्रणाली’ (CFCFRMS) को धरातल पर उतारा है। इस प्रणाली की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हेल्पलाइन नंबर ‘1930’ और ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से प्राप्त 23.61 लाख से अधिक शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई करते हुए अब तक 8,189 करोड़ रुपये से अधिक की राशि जालसाजों के खातों में जाने से बचाई जा चुकी है। इसके अलावा, ठगों के बुनियादी ढांचे को नष्ट करने के लिए सरकार ने अब तक 12.21 लाख से अधिक संदिग्ध सिम कार्ड और 3 लाख से ज्यादा मोबाइल फोन (IMEI) ब्लॉक किए हैं, जिससे साइबर अपराधियों के संचार माध्यमों पर कड़ा प्रहार हुआ है।
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अपराधियों की पहचान को और अधिक सटीक बनाने के लिए सितंबर 2024 में ‘सस्पेक्ट रजिस्ट्री’ की शुरुआत की गई, जो बैंकिंग क्षेत्र और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच सेतु का काम कर रही है। इस रजिस्ट्री के माध्यम से बैंकों को 21 लाख से अधिक संदिग्ध पहचानकर्ताओं और लगभग 26 लाख ‘म्यूल खातों’ (वे खाते जिनका उपयोग ठगी का पैसा घुमाने के लिए होता है) की जानकारी दी गई है। इस डेटा शेयरिंग के कारण बैंकों ने 9,055 करोड़ रुपये के संदिग्ध लेन-देन को सफलतापूर्वक रोक दिया है। यह प्रणाली सुनिश्चित करती है कि यदि कोई अपराधी एक राज्य में ठगी करता है, तो उसकी जानकारी तुरंत देशभर के वित्तीय संस्थानों तक पहुँच जाए।
तकनीकी मोर्चे पर I4C का ‘समन्वय प्लेटफॉर्म’ और उसका विशेष ‘प्रतिबिंब’ मॉड्यूल राज्यों की पुलिस के लिए जादुई हथियार साबित हो रहे हैं। यह मॉड्यूल अपराधियों की भौगोलिक स्थिति (Location) को मानचित्र पर प्रदर्शित करता है, जिससे पुलिस को यह पता चल जाता है कि ठगी का कॉल कहाँ से आ रहा है। इस सटीक मैपिंग और अंतर-राज्यीय समन्वय के चलते अब तक 20,853 आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इसके साथ ही, कानूनी प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए दिल्ली और राजस्थान सहित पांच राज्यों में ई-एफआईआर (e-FIR) की सुविधा भी शुरू की गई है, ताकि पीड़ित व्यक्ति घर बैठे अपनी शिकायत दर्ज करा सके और मामले की जांच तुरंत शुरू हो सके।
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