1.  स्मार्ट किसान-स्मार्ट खेती: 1.56 करोड़ किसानों को मोबाइल पर मिल रहा रीयल-टाइम वेदर अपडेट; IMD ने राज्य पोर्टल्स के साथ किया डेटा एकीकृत

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने पिछले एक दशक में तकनीकी नवाचारों के माध्यम से मौसम पूर्वानुमान की सटीकता में अभूतपूर्व सफलता हासिल की है। लोकसभा में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, पिछले 10 वर्षों में गंभीर मौसम घटनाओं के पूर्वानुमान के औसत कौशल में 30-40% की वृद्धि दर्ज की गई है। विशेष रूप से कर्नाटक जैसे राज्यों में भारी वर्षा की चेतावनियों में जबरदस्त सुधार देखा गया है, जहाँ तटीय क्षेत्रों में पहले दिन के पूर्वानुमान की सटीकता अब 92% तक पहुँच गई है। यह सुधार न केवल डेटा संग्रह में बल्कि मल्टी-मॉडल एन्सेम्बल (MME) जैसी आधुनिक पूर्वानुमान रणनीतियों के उपयोग के कारण संभव हुआ है।

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मानसून के पूर्वानुमान में आई सटीकता देश की कृषि और अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा वरदान साबित हो रही है। वर्ष 2021-2024 के दौरान मानसून की भविष्यवाणी में औसत त्रुटि घटकर मात्र 2.28% रह गई है, जो कि 2017-2020 की अवधि के मुकाबले लगभग तीन गुना कम है। इस सफलता को और अधिक सशक्त बनाने के लिए देश भर में 47 डॉप्लर मौसम रडार (DWR) तैनात किए गए हैं, जिनसे अब भारत का 87% भौगोलिक क्षेत्र रडार की निगरानी में आ गया है। इसके अलावा, आपदा के समय त्वरित सूचना देने के लिए ‘सचेत’ (SACHET) मोबाइल सिस्टम के जरिए सीधे आम जनता तक रीयल-टाइम अलर्ट पहुँचाए जा रहे हैं।

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ग्रामीण स्तर पर कनेक्टिविटी सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने ‘ग्राम पंचायत स्तरीय मौसम पूर्वानुमान’ (GPLWF) पहल की शुरुआत की है। इसके तहत ई-ग्रामस्वराज और ‘मौसमग्राम’ जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से देश की लगभग सभी ग्राम पंचायतों के लिए स्थान-विशिष्ट पूर्वानुमान उपलब्ध कराए जा रहे हैं। अकेले कर्नाटक में 3.63 लाख से अधिक किसान व्हाट्सएप समूहों के माध्यम से सीधे मौसम अपडेट प्राप्त कर रहे हैं, जिससे वे अपनी फसलों और आजीविका को सुरक्षित रख पा रहे हैं।

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भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए भारत सरकार ने ‘मिशन मौसम’ शुरू किया है, जिसका लक्ष्य भारत को एक “जलवायु-स्मार्ट” राष्ट्र बनाना है। इस मिशन के तहत न केवल डॉप्लर रडार के कवरेज को विस्तार दिया जा रहा है, बल्कि ‘हीट एक्शन प्लान’ और शहरी जलवायु प्लेटफॉर्म जैसे विशिष्ट हस्तक्षेप भी किए जा रहे हैं। बेंगलुरु मौसम केंद्र और कृषि प्रबंधन संस्थानों के बीच हुए हालिया समझौतों (MoUs) से यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि मौसम विज्ञान का लाभ प्रदेश के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति और संवेदनशील तटीय समुदायों तक समय पर और प्रभावी ढंग से पहुँचता रहे।

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