जशपुर।
कभी जिस मिट्टी की महक से उम्मीद की मिठास आती थी, आज वहां के किसान अपनी मेहनत के ‘लाल रंग’ को फीका पड़ता देख रहे हैं। जशपुर, जिसे छत्तीसगढ़ का ‘छोटा तिब्बत’ कहा जाता है, अपनी आबोहवा के दम पर देश के ‘स्ट्राबेरी हब’ बनने की राह पर था। लेकिन आज हकीकत यह है कि बाजार की बेरुखी और सुविधाओं के अभाव ने किसानों के उत्साह पर पाला मार दिया है।

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जशपुर की सबसे बड़ी ताकत यहाँ का तापमान है। स्ट्राबेरी को फलने-फूलने के लिए जिस ठंडक की दरकार होती है, वह यहाँ की वादियों में कुदरती तौर पर मौजूद है।यहाँ का तापमान स्ट्राबेरी के लिए बिलकुल अनुकूलित है यहाँ सर्दियों में पारा 0^\circ C से 5^\circ C तक गिरता है, जो पौधों को जरूरी ‘चिलिंग आवर्स’ देता है। फूल आने के लिए 8 से 15^\circ C और फल पकने के लिए 15 से 22^\circ C का जो संतुलन चाहिए, वह जशपुर की सर्दियों में बखूबी मिलता है।अक्टूबर-नवंबर की रोपाई के बाद जनवरी से मार्च तक लाल-चटक स्ट्राबेरी की फसल तैयार हो जाती है।
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प्रीमियम फल, पर लोकल बाजार में दम तोड़ती कीमत
विटामिन-C और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर यह ‘सुपरफूड’ शहरी बाजारों और फाइव-स्टार की पसंद तो है, लेकिन जशपुर के किसानों के लिए यह ‘महंगा शौक’ साबित होने लगा है।लेकिन अभी भी जशपुर में स्ट्राबेरी की खेती चुनौतियों का सफऱ है स्ट्राबेरी बहुत जल्दी खराब होने वाली फसल है। जशपुर के पास न तो इसे बड़े शहरों तक पहुंचाने के लिए ‘रेफ्रिजरेटेड वैन’ हैं और न ही कोल्ड स्टोरेज।
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जब ताजा फल नहीं बिकता, तो उसे जैम, जेली या जूस में बदलने की कोई यूनिट यहाँ उपलब्ध नहीं है। लागत अधिक होने के कारण स्थानीय खरीदार कम हैं और बाहरी खरीदारों तक पहुंच का कोई पक्का रास्ता नहीं बना।
साल 2026 की शुरुआत के साथ ही जशपुर की स्ट्रॉबेरी अखबारों की सुर्खियों में रही है। सरकारी दावों और हेडलाइंस में इसे ‘बंपर मुनाफा’ और ‘9 गुना ज्यादा कमाई’ वाली फसल बताया जा रहा है। लेकिन इन चमकती तस्वीरों के पीछे एक कड़वा सच भी है, जो धीरे-धीरे किसानों के खेतों तक पसर रहा है।

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जशपुर की सर्द हवाएं और 0 से 5 डिग्री सेल्सियस तक का गिरता पारा स्ट्रॉबेरी के लिए कुदरती वरदान तो बना, लेकिन यह वरदान अब व्यवस्था की बेरुखी के कारण बोझ बनने लगा है। अक्टूबर में रोपाई और जनवरी से मार्च की पैदावार के इस चक्र में किसान मेहनत तो झोंक रहा है, पर उसके हाथ में आने वाला मुनाफा बाजार के उतार-चढ़ाव की भेंट चढ़ रहा है।
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लोग दावा करते है स्ट्रॉबेरी ने जशपुर के किसानों की तकदीर बदल दी है, पर हकीकत यह है कि यह फसल अब भी ‘महंगे जुए’ की तरह है। स्ट्रॉबेरी एक बेहद नाजुक फल है जिसे तोड़ते ही बाजार या सुरक्षित भंडारण की जरूरत होती है। जशपुर में 15 से 22 डिग्री सेल्सियस के आदर्श तापमान पर फल तो पककर तैयार हो जाते हैं, लेकिन इन्हें सहेजने के लिए न तो यहाँ कोई बड़ा कोल्ड स्टोरेज बना और न ही प्रोसेसिंग यूनिट.

प्रीमियम फल की लोकल मजबूरी
विटामिन सी और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर यह प्रीमियम फल शहरी होटलों में भारी कीमतों पर बिकता है, लेकिन जशपुर के किसान को इसे स्थानीय बाजारों में औने-पौने दामों पर बेचने को मजबूर होना पड़ता है। बाहर की मंडियों तक पहुंचने के लिए न तो कोई मजबूत ‘कोल्ड सप्लाई चेन’ है और न ही परिवहन की सुनिश्चित व्यवस्था। नतीजा यह है कि अतिरिक्त पैदावार होने पर फल खेतों में ही सड़ने लगते हैं या सस्ते में बेचने पड़ते हैं।
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जानकारों का मानना है कि किसान इस फसल से दूर नहीं भाग रहे, बल्कि वे जोखिम (Risk) से डर रहे हैं। यदि शासन और प्रशासन इसे दोबारा पटरी पर लाना चाहते हैं, तो तीन मोर्चों पर काम करना होगा सीधे शहरों के रिटेलर्स से अनुबंध।स्थानीय स्तर पर छोटी प्रोसेसिंग यूनिट्स की स्थापना। जलवायु परिवर्तन के दौर में तापमान आधारित सटीक खेती की ट्रेनिंग।

जानकारों का मानना है कि स्ट्रॉबेरी की खेती अब अपने सबसे नाजुक दौर में है। यदि इसे सिर्फ सरकारी विज्ञापनों तक सीमित रखा गया और धरातल पर प्रोसेसिंग यूनिट या मार्केट लिंकेज जैसे ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो किसानों का बचा-कुचा उत्साह भी खत्म हो जाएगा। जशपुर की ‘रेड गोल्ड’ क्रांति को कागजी आंकड़ों से निकलकर किसानों की जेब तक पहुंचना होगा, वरना यह शानदार प्रयोग भी इतिहास के पन्नों में एक ‘असफल कहानी’ बनकर दर्ज हो जाएगा।
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जशपुर की स्ट्राबेरी सिर्फ एक फल नहीं, बल्कि इस जिले की आर्थिक पहचान बदलने का जरिया है। अगर समय रहते इसे ‘बाजार का ऑक्सीजन’ नहीं मिला, तो खेतों में उग रही यह लालिमा सिर्फ यादों में रह जाएगी। किसानों का कम होता उत्साह एक चेतावनी है—खेतों में फसल उगाने से ज्यादा जरूरी है, उसे बाजार तक सुरक्षित पहुंचाना।

जशपुर की स्ट्रॉबेरी केवल एक फसल नहीं, बल्कि इस अंचल के किसानों के स्वाभिमान और आधुनिक खेती की ओर बढ़ते उनके कदमों का प्रतीक है। आज भले ही बाजार और लॉजिस्टिक्स की दीवारें ऊंची दिखाई दे रही हों, लेकिन समाधान असंभव नहीं है। यदि जशपुर की इस ‘लाल क्रांति’ को FPO (किसान उत्पादक संगठन) के माध्यम से संगठित बाजार से जोड़ा जाए और स्थानीय स्तर पर सौर-ऊर्जा आधारित छोटे कोल्ड स्टोरेज की व्यवस्था हो, तो किसान की मेहनत का एक भी दाना बर्बाद नहीं होगा।

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अब वक्त आ गया है कि हम स्ट्रॉबेरी को केवल एक ‘प्रयोग’ के तौर पर देखना बंद करें और इसे जशपुर की ‘ब्रांड पहचान’ के रूप में विकसित करें। प्रशासन, कृषि वैज्ञानिक और निजी निवेशकों का एक साझा ‘एक्शन प्लान’ न केवल किसानों के खेतों में चमक वापस लाएगा, बल्कि आने वाले वर्षों में जशपुर की पहचान देश की सबसे बड़ी ‘स्ट्रॉबेरी वैली’ के रूप में स्थापित करेगा।
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उम्मीद की यह मिठास बरकरार रहनी चाहिए, क्योंकि जशपुर की मिट्टी में वह दम है कि वह चुनौतियों के पाले को अपनी मेहनत की धूप से पिघला सके।

