मुंबई:
हिंदी सिनेमा में जब भी बेमिसाल संवाद अदायगी, धारदार डायलॉग और लाजवाब कॉमेडी का जिक्र होता है, तो सबसे पहला नाम कादर खान का जेहन में आता है। पर्दे पर कभी दर्शकों को हंसते-हंसते लोटपोट करने वाले तो कभी खूंखार विलेन बनकर रूह कंपा देने वाले कादर खान ने सिनेमा जगत में अपनी एक अमिट छाप छोड़ी। 22 अक्टूबर 1937 को काबुल (अफगानिस्तान) में जन्मे इस बहुमुखी कलाकार की आज 89वीं जयंती है। पर्दे पर मुस्कुराहटें बिखेरने वाले कादर खान का निजी जीवन संघर्ष, गरीबी और करिश्मों से भरा रहा।
तीन भाइयों की मौत के बाद छोड़ा काबुल, कमाठीपुरा की चॉल में बीता बचपन
कादर खान के पिता अब्दुल रहमान खान अरबी और इस्लामिक साहित्य के विद्वान थे और मां इकबाल बेगम थीं। कादर खान के जन्म से पहले उनके तीन बड़े भाइयों की असमय मौत हो गई थी। बार-बार बच्चों को खोने के सदमे से टूटी मां को लगने लगा कि काबुल का माहौल उनके बच्चों के हक में नहीं है। इसी डर से परिवार अफगानिस्तान छोड़कर मुंबई आ गया। मुंबई के कमाठीपुरा की एक तंग चॉल में उनका बचपन बीता। हालात ऐसे थे कि परिवार के पास कई बार दो वक्त के खाने तक के पैसे नहीं होते थे।
इंजीनियरिंग के प्रोफेसर थे कादर खान
कंगाली के दौर में भी कादर खान ने पढ़ाई नहीं छोड़ी। कम ही लोग जानते हैं कि वे बेहद पढ़े-लिखे इंसान थे। उन्होंने इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की और फिल्मों में मुकाम हासिल करने से पहले ‘साबू सिद्दीक कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग’ में बतौर सिविल इंजीनियरिंग प्रोफेसर छात्रों को पढ़ाते रहे।
जब कब्रिस्तान बना रिहर्सल का मंच, अशरफ खान ने पहचाना हुनर
कादर खान को बचपन से ही नाटकों और संवाद बोलने का जुनून था। चॉल के शोरगुल और भीड़भाड़ से बचने के लिए वे रात के अंधेरे में दक्षिण मुंबई के एक कब्रिस्तान में चले जाते थे। वहां कब्रों के बीच अकेले खड़े होकर वे घंटों तक पूरी शिद्दत से डायलॉग बोलने का अभ्यास किया करते थे।
एक दिन मशहूर थिएटर अभिनेता अशरफ खान ने कब्रिस्तान में इस लड़के को पूरे जोश से एक्टिंग करते देखा। वे उनके टैलेंट से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने तुरंत कादर खान को अपने नाटक में रोल ऑफर कर दिया। यहीं से उनकी थिएटर की यात्रा शुरू हुई। बाद में उनके एक कॉलेज प्ले को देखकर खुद लीजेंडरी एक्टर दिलीप कुमार भी उनके कायल हो गए थे।
400 रुपये की सैलरी और डायलॉग लिखने के मिले ₹1.21 लाख
थिएटर के दिनों में कादर खान की कलम का जादू चलना शुरू हुआ। 1972 में आई फिल्म ‘जवानी दीवानी’ के संवाद लिखने के लिए उन्हें 1,500 रुपये मिले। इसके बाद 1973 में उन्होंने यश चोपड़ा की फिल्म ‘दाग’ से बतौर अभिनेता डेब्यू किया, जिसमें वे वकील बने थे।
कादर खान के जीवन में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब दिग्गज फिल्ममेकर मनमोहन देसाई ने उनकी प्रतिभा को पहचाना। मनमोहन देसाई ने फिल्म ‘रोटी’ के डायलॉग लिखने के लिए उन्हें 1 लाख 21 हजार रुपये का चेक दिया। उस समय कादर खान की बतौर प्रोफेसर महीने की तनख्वाह सिर्फ 400 रुपये थी। इस एक झटके ने उनके पूरे जीवन और आर्थिक तंगी को हमेशा के लिए बदल दिया।
अमिताभ के ‘एंग्री यंग मैन’ की सबसे मजबूत आवाज बने
कादर खान सिर्फ एक मंझे हुए अभिनेता ही नहीं थे, बल्कि वे हिंदी सिनेमा के सबसे कामयाब पटकथा व संवाद लेखकों में गिने गए। उन्होंने अमिताभ बच्चन के करियर की मील का पत्थर साबित हुईं फिल्में—’अमर अकबर एंथनी’, ‘मुकद्दर का सिकंदर’, ‘लावारिस’, ‘शराबी’, ‘कुली’ और ‘अग्निपथ’ के ऐतिहासिक डायलॉग लिखे। उनकी खूबी थी कि वे कठिन और दार्शनिक बातों को भी आम दर्शकों की जुबान में ढाल देते थे। 300 से अधिक फिल्मों में अभिनय करने वाले कादर खान भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी कलम और अदाकारी का जादू भारतीय सिनेमा में हमेशा जिंदा रहेगा।


