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पटना/रांची: भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत में लोकपर्वों का विशेष स्थान है, और इसी कड़ी में आज, 14 अप्रैल 2026 (मंगलवार) को बिहार, झारखंड और विशेषकर मिथिलांचल के क्षेत्रों में ‘सतुआन’ का पर्व बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि सर्दी के विदा होने और भीषण गर्मी के आगमन का वैज्ञानिक संकेत भी देता है।

मेष संक्रांति और नए साल का आगाज

हिंदू सौर कैलेंडर के अनुसार, आज सूर्य मीन राशि से निकलकर मेष राशि में प्रवेश कर रहे हैं, जिसे ‘मेष संक्रांति’ कहा जाता है। इसे नए साल की शुरुआत के रूप में भी देखा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, आज की सूर्य की किरणों में ‘अमृत तत्व’ होता है, जो आरोग्य और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है।

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गर्मी का ‘कवच’ है सत्तू

सतुआन का मुख्य आकर्षण सत्तू है। मौसम में अचानक आ रहे बदलाव और बढ़ती तपिश को देखते हुए सत्तू का सेवन शरीर को भीतर से ठंडा रखने और लू (Heatwave) से बचाने में सहायक होता है। परंपरा के अनुसार, आज के दिन नए अनाज के सत्तू के साथ गुड़, मूली और कच्चे आम (टिकौला) का सेवन किया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान विष्णु ने राजा बलि पर विजय के पश्चात सत्तू का सेवन किया था, तभी से यह परंपरा चली आ रही है।

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अनोखी पूजा विधि और प्रकृति संरक्षण

सतुआन की परंपराएं प्रकृति से गहरे जुड़ाव को दर्शाती हैं:

  • पवित्र जल का छिड़काव: एक दिन पहले घड़े में रखे जल से घर की शुद्धि की जाती है।

  • पितरों की तृप्ति: तुलसी के पौधे में जल का घड़ा बांधा जाता है, जिसे पितरों की प्यास बुझाने का प्रतीक माना जाता है।

  • शीतलता का आशीर्वाद: घर की बुजुर्ग महिलाएं बच्चों के सिर पर ठंडे पानी से ‘थापा’ देती हैं, ताकि वे पूरे साल भीषण गर्मी से सुरक्षित रहें।

  • पेड़ों की सेवा: शाम को पेड़ों में पानी डालने की परंपरा है, जो प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता को उजागर करती है।

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एक दिन, कई त्योहार

14 अप्रैल का दिन भारत की विविधता में एकता का परिचायक है। आज जहां बिहार-झारखंड में सतुआन मनाया जा रहा है, वहीं पंजाब में बैसाखी, बंगाल में पोइला बैसाख, असम में बिहू और केरल में विशु की धूम है। ये सभी त्योहार नई फसल और नई शुरुआत के उत्सव हैं।

सामाजिक और स्वास्थ्य संदेश

सतुआन पर्व हमें आधुनिक युग में भी अपनी जड़ों से जुड़ने और मौसम के अनुकूल जीवनशैली अपनाने की सीख देता है। यह पर्व सादगी, जल संरक्षण और आपसी प्रेम का संदेश लेकर आता है।

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