विशेष आलेख: [समीर इरफ़ान]
छत्तीसगढ़ की धरा पर मकर संक्रांति केवल ऋतु परिवर्तन का सूचक नहीं, बल्कि यह यहाँ के जनजीवन, लोक परंपराओं और मिट्टी से जुड़ाव का एक जीवंत उत्सव है। जब खेतों में धान की कटाई और मिंजाई के बाद कोठार (अन्न भंडार) नए अनाज से भर जाते हैं, तब सूर्य के उत्तरायण होने पर पूरे प्रदेश में एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक उल्लास का संचार होता है। गाँवों में यह पर्व केवल एक तिथि मात्र नहीं है, बल्कि प्रकृति और किसानी संस्कृति के प्रति अटूट कृतज्ञता जताने का एक पावन जरिया है।
पवित्र संगम स्नान और दान की महिमा
छत्तीसगढ़ में संक्रांति के अवसर पर पवित्र नदियों में स्नान करने की सदियों पुरानी परंपरा है। महानदी, शिवनाथ और पैरी के पावन संगम राजिम (छत्तीसगढ़ का प्रयाग), शिवरीनारायण और सिरपुर जैसे धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं का विशाल सैलाब उमड़ता है। इस दिन तड़के सुबह ‘नदी स्नान’ के बाद तिल और गुड़ का दान करना अनिवार्य माना जाता है। लोक मान्यता है कि संक्रांति पर किया गया दान अक्षय पुण्य फल देता है और जीवन के कष्टों को दूर करता है।
व्यंजनों में रची-बसी मिठास: ‘तिल-गुड़ खाये के और गोठियाए के’
छत्तीसगढ़ी घरों में संक्रांति के पकवानों की अपनी एक विशिष्ट पहचान है। रसोई से उठने वाली तिल और गुड़ की सोंधी महक त्यौहार के आगमन की घोषणा करती है। यहाँ मुख्य रूप से तिल के लड्डू (तिलवां), मुरा के लड्डू और फल्ली की चिक्की बनाई जाती है। नए चावल और उड़द दाल की ‘खिचड़ी’ को घी और ताजे गुड़ के साथ परोसना यहाँ की परंपरा का अभिन्न हिस्सा है। गाँव के चौपालों पर जब बुजुर्ग और युवा साथ बैठकर ‘तिल-गुड़ खाये के और गोठियाए के’ (मीठा खाना और मीठा बोलना) की बात करते हैं, तो आपसी रिश्तों की कड़वाहट भी मिठास में बदल जाती है।
बस्तर से सरगुजा: प्रकृति और लोक नृत्य की जुगलबंदी
प्रदेश के जनजातीय अंचलों, विशेषकर बस्तर और सरगुजा में, मकर संक्रांति प्रकृति की सेवा का उत्सव है। यहाँ के आदिवासी समुदायों में ‘देवगुड़ी’ (ग्राम देवता का स्थान) की पूजा की जाती है और नई फसल का भोग लगाया जाता है। मांदर, ढोल और नगाड़ों की गूँजती थाप के बीच जब ग्रामीण ‘रेला’ और ‘करमा’ नृत्य की धुन पर थिरकते हैं, तो पूरा अंचल एक सामूहिक ऊर्जा से भर उठता है। यह सामूहिकता ही छत्तीसगढ़ी संस्कृति की असली पहचान है, जहाँ उत्सव का अर्थ व्यक्तिगत खुशी नहीं बल्कि पूरे गाँव की भागीदारी है।
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पशुधन का सम्मान और ‘मड़ई’ की रौनक
छत्तीसगढ़िया किसान अपने पशुधन को लक्ष्मी का साक्षात रूप मानते हैं। संक्रांति के शुभ अवसर पर गौशालाओं और गौठानों में गायों की विशेष पूजा की जाती है और उन्हें बड़े चाव से खिचड़ी खिलाई जाती है। इसके साथ ही, गाँवों और कस्बों के खुले मैदानों में लगने वाली ‘मड़ई’ और मेले ग्रामीण अर्थव्यवस्था और लोक कला के संगम होते हैं। इन मेलों में स्थानीय हस्तशिल्प, मिट्टी के बर्तन और पारंपरिक पकवानों का बाजार सजता है, जहाँ आधुनिकता और परंपरा का अनूठा मेल देखने को मिलता है।
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पर्यटन और सामूहिकता का संगम
संक्रांति के दिन बड़ी संख्या में लोग पर्यटन स्थलों की ओर भी रुख करते हैं। चित्रकोट, तीरथगढ़ जैसे झरनों या महानदी के किनारों पर परिवार और मित्र समूह मिलकर खुले आसमान के नीचे पत्थर के चूल्हों पर भोजन पकाते हैं। यह ‘पिकनिक’ मात्र सैर-सपाटा नहीं, बल्कि भागदौड़ भरी जिंदगी से निकलकर प्रकृति की गोद में कुछ पल सुकून से बिताने और अपनी जड़ों की ओर लौटने का एक प्रयास है।
मकर संक्रांति छत्तीसगढ़ की समृद्ध विरासत को हर साल नया निखार देती है। यह पर्व हमें सिखाता है कि हम चाहे कितने भी आधुनिक हो जाएँ, हमारी असली पूंजी हमारी खेती, प्रकृति और वह समाज है जो एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ खड़ा होता है। मकर संक्रांति की यह धूप हम सभी के जीवन में समृद्धि और रिश्तों में मधुरता लेकर आए, यही इस पर्व का मूल संदेश है।
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