बिलासपुर।
छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में संचालित प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण (मिड-डे मील) योजना को लेकर छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार के प्रति सख्त रुख अपनाया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने सरकार से जवाब तलब करते हुए पूछा है कि जब बच्चों को पौष्टिक आहार देने के उद्देश्य से हफ्ते में तीन दिन 20 ग्राम मिलेट चिक्की (बाजरा, कोदो-कुटकी) देने का निर्णय लिया गया है, तो इसे केवल 7 जिलों में ही क्यों लागू किया गया है? अदालत ने सवाल उठाया कि राज्य के शेष 26 जिलों के स्कूली बच्चों को इस पोषण लाभ से वंचित क्यों रखा जा रहा है।
मीडिया रिपोर्टों पर हाईकोर्ट ने लिया स्वतः संज्ञान
दरअसल, प्रदेश के सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील योजना के क्रियान्वयन में आ रही गड़बड़ियों और बदहाली को लेकर लगातार खबरें आ रही थीं। इन मीडिया रिपोर्टों को गंभीरता से लेते हुए चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा ने मामले में स्वतः संज्ञान लिया और इसे जनहित याचिका (PIL) के रूप में दर्ज कर सुनवाई शुरू की।
न्यायमित्र नियुक्त, 12 अक्टूबर को अगली सुनवाई
मामले की निष्पक्ष जांच के लिए डिवीजन बेंच ने एक न्यायमित्र (Amicus Curiae) नियुक्त किया है। न्यायमित्र को निर्देश दिए गए हैं कि वे विभिन्न स्कूलों का दौरा कर मिड-डे मील योजना की जमीनी और वास्तविक स्थिति की रिपोर्ट अदालत के समक्ष पेश करें। इस मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर तय की गई है।
मुख्य सचिव के हलफनामे से हुआ खुलासा
सुनवाई के दौरान न्यायमित्र ने राज्य के मुख्य सचिव द्वारा प्रस्तुत शपथ पत्र (अफेडेविट) के पैरा-7 का हवाला दिया। उन्होंने कोर्ट को अवगत कराया कि सरकार ने खुद यह स्वीकार किया है कि 20 ग्राम मिलेट चिक्की का वितरण वर्तमान में केवल ‘नियद नेल्लानार योजना’ के अंतर्गत आने वाले 5 जिलों तथा जशपुर और रायगढ़ समेत कुल 7 जिलों में ही किया जा रहा है। इस अंतर पर हाईकोर्ट ने गहरी नाराजगी जताते हुए पूरे प्रदेश में समान रूप से योजना लागू न करने का कारण स्पष्ट करने को कहा है।



