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1 अप्रैल से लागू होने वाले नए आयकर नियमों का सबसे बड़ा असर यह है कि अब नई टैक्स व्यवस्था (New Tax Regime) को ‘डिफॉल्ट’ बना दिया गया है। इसका सीधा मतलब यह है कि यदि आप खुद से कोई चुनाव नहीं करते हैं, तो आपका टैक्स अपने आप नई दरों से कटेगा। इस नई व्यवस्था को आकर्षक बनाने के लिए सरकार ने टैक्स स्लैब में बड़े बदलाव किए हैं, जिसके तहत अब ₹3 लाख तक की आय को पूरी तरह कर-मुक्त रखा गया है। इसके साथ ही, धारा 87A के तहत मिलने वाली छूट की वजह से अब ₹7 लाख तक की सालाना कमाई करने वालों को एक भी रुपया टैक्स नहीं देना होगा।

आय की सीमा टैक्स दर
₹0 – ₹3,00,000 शून्य (0%)
₹3,00,001 – ₹7,00,000 5%
₹7,00,001 – ₹10,00,000 10%
₹10,00,001 – ₹12,00,000 15%
₹12,00,001 – ₹15,00,000 20%
₹15,00,000 से अधिक 30%

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वेतनभोगी वर्ग के लिए एक राहत की बात यह भी है कि अब नई टैक्स व्यवस्था में भी स्टैंडर्ड डिडक्शन का लाभ जोड़ दिया गया है, जिससे आपकी कर योग्य आय में सीधे ₹50,000 (या नए प्रावधानों के अनुसार ₹75,000) की और कटौती हो जाएगी। निवेश के नजरिए से देखें तो अब नियमों को सरल बनाने की कोशिश की गई है। अचल संपत्ति की बिक्री पर मिलने वाले इंडेक्सेशन के लाभ को खत्म कर अब लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन (LTCG) पर एक समान 12.5% की दर तय की गई है।

शेयर बाजार और म्यूचुअल फंड निवेशकों के लिए भी होल्डिंग पीरियड के नियमों को स्पष्ट किया गया है, ताकि लिस्टेड और अनलिस्टेड संपत्तियों पर लगने वाले टैक्स में कोई भ्रम न रहे। कुल मिलाकर, 1 अप्रैल से शुरू होने वाला यह नया नियम उन लोगों के लिए ज्यादा फायदेमंद है जो निवेश के कागजात जमा करने के झंझट से बचकर सीधी और कम टैक्स दरों का लाभ उठाना चाहते हैं। हालांकि, जो लोग होम लोन के ब्याज या LIC जैसे निवेशों पर भारी छूट लेना चाहते हैं, उन्हें पुरानी टैक्स व्यवस्था चुनने का विकल्प अभी भी बरकरार रहेगा।

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पुरानी टैक्स व्यवस्था उन करदाताओं के लिए एक मजबूत ढाल की तरह काम करती है जो भविष्य के लिए निवेश करना पसंद करते हैं। इसमें आपको टैक्स बचाने के व्यापक अवसर मिलते हैं, जैसे कि होम लोन के ब्याज पर छूट, जीवन बीमा (LIC), पीपीएफ (PPF), और बच्चों की ट्यूशन फीस जैसी बचत (धारा 80C)। इसके अलावा, अगर आप किराए के मकान में रहते हैं और HRA का लाभ लेना चाहते हैं या अपने परिवार के स्वास्थ्य बीमा (80D) पर कटौती चाहते हैं, तो पुरानी व्यवस्था ही आपके लिए सबसे ज्यादा फायदेमंद साबित होती है। यह उन लोगों को बड़ी राहत देती है जिनकी निवेश राशि और अन्य कटौतियां मिलकर सालाना ₹3.75 लाख से अधिक हो जाती हैं।

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इसके विपरीत, नई टैक्स व्यवस्था सादगी और अधिक ‘टेक-होम सैलरी’ (हाथ में आने वाला वेतन) पर केंद्रित है। इसे उन लोगों को ध्यान में रखकर बनाया गया है जो निवेश के बोझ और कागजी कार्रवाई के झंझट में नहीं पड़ना चाहते। इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें टैक्स की दरें काफी कम हैं और ₹7 लाख तक की शुद्ध आय पर आपको कोई टैक्स नहीं देना पड़ता। यहाँ आपको निवेश के सबूत जैसे रेंट रसीद या एलआईसी के कागजात जमा करने की जरूरत नहीं होती, जिससे रिटर्न भरना बहुत आसान हो जाता है। हालांकि इसमें निवेश पर मिलने वाली अधिकांश छूट खत्म कर दी गई हैं, लेकिन वेतनभोगियों के लिए स्टैंडर्ड डिडक्शन का लाभ बरकरार रखा गया है।

संक्षेप में कहें तो, यदि आपके पास बड़े निवेश और होम लोन जैसे खर्चे हैं, तो पुरानी व्यवस्था आपके टैक्स को न्यूनतम स्तर पर ला सकती है। वहीं, अगर आप कम आय वर्ग में हैं या अपनी सैलरी का बड़ा हिस्सा बिना किसी निवेश पाबंदी के खर्च करना चाहते हैं, तो नई व्यवस्था आपके लिए अधिक नकदी और मानसिक शांति सुनिश्चित करती है।

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