विशेष | फैज़ान अशरफ
जब कोई अधिकारी वर्दी को केवल पद नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और संकल्प की तरह धारण करता है, तब उसकी पहचान आदेशों से नहीं, परिणामों से होती है।
छत्तीसगढ़ पुलिस में ऐसा ही एक नाम है : शशि मोहन सिंह। जशपुर में अपराध पर निर्णायक प्रहार के बाद अब उनका स्थानांतरण रायगढ़ जिले में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के रूप में हुआ है। जशपुर की धरती पर जिस सख्त और संवेदनशील पुलिसिंग की नींव उन्होंने रखी, उसकी गूंज अब रायगढ़ में सुनाई देने वाली है।

बिहार के बक्सर जिले के छोटे से गांव दुल्लहपुर से निकलकर छत्तीसगढ़ पुलिस की खाकी में भरोसे का प्रतीक बनना आसान नहीं था। हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर करने के बाद उन्होंने अपने करियर की शुरुआत लेक्चरर के रूप में की। लेकिन समाज को बदलने की उनकी आकांक्षा किताबों तक सीमित नहीं रही। वर्ष 1996 में पीएससी उत्तीर्ण कर डीएसपी बने शशि मोहन सिंह ने उसी क्षण यह तय कर लिया था कि वर्दी उनके लिए सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि मिशन होगी।

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जशपुर में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के रूप में उनका कार्यकाल आंकड़ों से कहीं आगे की कहानी कहता है। वर्ष 2025 में जशपुर पुलिस ने कुल 2386 प्रकरण दर्ज किए, जिनमें से 2162 मामलों का निराकरण किया गया। 92 प्रतिशत से अधिक की यह सफलता दर केवल प्रशासनिक दक्षता नहीं, बल्कि मजबूत नेतृत्व और स्पष्ट दिशा का प्रमाण बनी। हत्या, बलात्कार, पोक्सो, लूट और चोरी जैसे गंभीर अपराधों में तेज जांच, समयबद्ध गिरफ्तारी और पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण ने आम नागरिकों में सुरक्षा का विश्वास लौटाया।

नशे और तस्करी के खिलाफ जशपुर में पुलिस की कार्रवाई ने राज्य स्तर पर पहचान बनाई। ऑपरेशन आघात के तहत लगभग चार करोड़ रुपये मूल्य की अवैध शराब जब्त की गई, जबकि गांजा, कफ सिरप और अन्य नशीले पदार्थों की दो करोड़ रुपये से अधिक की खेप पकड़ी गई। अंतरराज्यीय तस्करी नेटवर्क पर यह सीधा प्रहार था। पहली बार सफेमा कानून के तहत गांजा तस्करों की 1.88 करोड़ रुपये की संपत्ति कुर्क कर यह संदेश दिया गया कि अपराध से अर्जित संपत्ति भी सुरक्षित नहीं रहेगी।
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गौ-तस्करी जैसे संवेदनशील मुद्दे पर चलाया गया ऑपरेशन शंखनाद जशपुर पुलिस की बड़ी उपलब्धि रहा। 144 प्रकरणों में 239 आरोपियों की गिरफ्तारी, लगभग 1500 गौवंश की बरामदगी और तीन करोड़ रुपये से अधिक के वाहनों की जब्ती ने लंबे समय से सक्रिय तस्करी नेटवर्क को लगभग समाप्त कर दिया। इस अभियान ने स्पष्ट कर दिया कि कानून और सामाजिक आस्था दोनों की रक्षा सरकार की प्राथमिकता है।
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जहां एक ओर शशि मोहन सिंह अपराधियों के लिए सख्त रहे, वहीं मानव तस्करी और बच्चों से जुड़े मामलों में उनका मानवीय पक्ष सामने आया। “कजरी – द बैटल फॉर फ्रीडम” जैसी पहल के माध्यम से जागरूकता फैलाई गई, तो दूसरी ओर कर्नाटक और दिल्ली जैसे राज्यों से बेटियों को सुरक्षित वापस लाया गया। ऑपरेशन मुस्कान के जरिए गुमशुदा बच्चों को उनके परिवारों से मिलाना पुलिस की संवेदनशीलता का उदाहरण बना।

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अभिनय, कला और खाकी का अनूठा संगम
शशि मोहन सिंह की पहचान सिर्फ एक सख्त पुलिस अधिकारी की नहीं रही। वे कला और साहित्य से गहरे जुड़े रहे हैं। भोजपुरी और छत्तीसगढ़ी फिल्मों में अभिनय के साथ-साथ कविता के माध्यम से भी उन्होंने समाज से संवाद किया। खाकी के भीतर बसे इस संवेदनशील मन ने उन्हें जनता के और करीब ला खड़ा किया।अब जशपुर से विदा लेकर वे रायगढ़ जिले की कमान संभालेंगे।

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गए अभियान उनकी कार्यशैली की मजबूत बुनियाद हैं। यही अनुभव अब रायगढ़ की कानून व्यवस्था को नई दिशा देने की उम्मीद जगा रहा है।
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जशपुर उन्हें एक ऐसे कप्तान के रूप में याद रखेगा, जिसने सख्ती और संवेदना के बीच संतुलन बनाकर पुलिसिंग की मिसाल पेश की। कहानी यहां समाप्त नहीं होती, बस मंच बदलता है। खाकी का वही जुनून, वही प्रतिबद्धता और वही न्याय की भावना अब रायगढ़ में दिखाई देगी।क्योंकि जब वर्दी में इंसाफ बसता है, तब वह जनता के लिए भरोसा और अपराधियों के लिए काल बन जाती है।
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कहानी यहाँ समाप्त नहीं होती, बस मंच बदलता है। खाकी का वही जुनून, वही प्रतिबद्धता और वही न्याय की भावना अब रायगढ़ की सड़कों पर दिखाई देगी। क्योंकि जब वर्दी में इंसाफ बसता है, तब वह जनता के लिए ‘भरोसा’ और अपराधियों के लिए ‘काल’ बन जाती है।
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”अपराधियों के लिए कानून का खौफ और आम जनता के लिए खाकी का साथ यही मेरी पुलिसिंग का मूलमंत्र है।” : शशि मोहन सिंह (SSP)


