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रांची: झारखंड की धरती ने एक ऐसा राज उगला है जिसे सुनकर वैज्ञानिक भी हैरान हैं। उत्तरी करणपुरा की अशोक कोयला खदान में खुदाई के दौरान 30 करोड़ साल पुराने एक ऐसे इकोसिस्टम के सबूत मिले हैं, जो उस दौर का है जब दुनिया के नक्शे पर न तो इंसान थे और न ही डायनासोर। बीरबल साहनी जीवाश्म विज्ञान संस्थान के शोध में खुलासा हुआ है कि करोड़ों साल पहले झारखंड का यह हिस्सा घने दलदली जंगलों और समुद्र के खारे पानी से घिरा हुआ था…
झारखंड की धरती के भीतर दबे रहस्यों ने विज्ञान की दुनिया में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। हाल ही में नई दिल्ली के पीआईबी द्वारा जारी जानकारी के अनुसार, झारखंड की खुली कोयला खदानों से एक ऐसे लुप्त इकोसिस्टम के साक्ष्य मिले हैं, जो मनुष्यों और यहाँ तक कि डायनासोरों के अस्तित्व से भी करोड़ों साल पहले इस धरती पर विद्यमान था। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के स्वायत्त संस्थान, बीरबल साहनी जीवाश्म विज्ञान संस्थान (BSIP) के नेतृत्व में किए गए एक बहुविषयक अध्ययन ने झारखंड के उत्तरी करणपुरा बेसिन में स्थित अशोक कोयला खदान से प्राचीन पौधों और भू-रासायनिक संकेतों का पता लगाया है। ये प्रमाण उस दौर की तस्वीर पेश करते हैं जब भारत, अंटार्कटिका, दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया मिलकर विशाल महाद्वीप ‘गोंडवानालैंड’ का हिस्सा हुआ करते थे।
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अध्ययन के दौरान खदान की शेल परतों में लगभग 30 करोड़ वर्ष पुराने घने दलदली जंगलों और नदियों के जाल के निशान पाए गए हैं। वैज्ञानिकों को यहाँ ग्लॉसॉप्टेरिस (Glossopteris) नामक विलुप्त बीज वाले पौधों की कम से कम 14 अलग-अलग प्रजातियों के जीवाश्म मिले हैं, जिनमें पत्तियों के नाजुक निशान, जड़ें और पराग कण सुरक्षित अवस्था में हैं। इस खोज की सबसे बड़ी वैश्विक उपलब्धि दामोदर बेसिन में ग्लॉसॉप्टेरिस के पहले ‘किशोर नर शंकु’ का मिलना है, जिसे वनस्पति विज्ञान का एक ऐसा ‘अधूरा हिस्सा’ माना जा रहा है जो प्राचीन वृक्षों की उत्पत्ति को समझने में वैज्ञानिकों की मदद करेगा।
इस शोध का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू प्राचीन समुद्री अतिक्रमण से जुड़ा है। सूक्ष्मदर्शी से कोयले और शेल के कणों की जांच करने पर उनमें फ्रैम्बोइडल पाइराइट और सल्फर का असामान्य रूप से उच्च स्तर पाया गया है, जो इस बात का पुख्ता संकेत है कि करोड़ों साल पहले इस बेसिन में खारा समुद्री पानी पहुँच गया था। कार्बनिक अणुओं के रासायनिक विश्लेषण से यह स्पष्ट हुआ है कि लगभग 280-290 मिलियन वर्ष पहले पर्मियन सागर का मार्ग पूर्वोत्तर भारत से मध्य भारत की ओर था। यह अध्ययन न केवल अतीत की जानकारी देता है, बल्कि वर्तमान में ध्रुवीय बर्फ पिघलने और बढ़ते समुद्र के स्तर के बीच समानताएं बताते हुए भविष्य के संभावित भौगोलिक परिवर्तनों के प्रति भी आगाह करता है। ‘इंटरनेशनल जर्नल ऑफ कोल जियोलॉजी’ में प्रकाशित यह निष्कर्ष भारत के भू-वैज्ञानिक इतिहास को समझने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगा।
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