जशपुरनगर:
दशहरा यानी रावण के पुतले का जलना, आसमान में बिखरती आतिशबाजी और लोगों की भीड़—देशभर में सदियों से यही एक घिसा-पिटा फॉर्मूला दोहराया जाता रहा है। लेकिन अगर आप कभी छत्तीसगढ़ के आदिवासी अंचल जशपुर पहुँच जाएं, तो यहाँ का दशहरा आपकी सारी स्थापित धारणाओं को तार-तार कर देगा।
बस्तर के बाद सूबे के इस दूसरे सबसे बड़े महाउत्सव में एक ऐसा खौफनाक और रोमांचक मंजर दिखता है, जिसकी कल्पना देश के किसी अन्य कोने में नहीं की जा सकती—यहाँ रावण जलता नहीं है, बल्कि उस पर लोगो के द्वारा पत्थरों की ताबड़तोड़ फेंके जाते है!

27 पीढ़ियों से अपनी रियासतकालीन भव्यता और आदिम संस्कृति की माटी की महक को सहेजे यह उत्सव महज एक पर्व नहीं, बल्कि सदियों पुराने जन-आक्रोश और इतिहास का एक ऐसा जीवंत दस्तावेज है, जो दिल की धड़कनें तेज कर दे।
पहले ज्ञान को शीश झुकाओ, फिर अहंकार पर पत्थरों से प्रहार करो!
जशपुर के रणजीता स्टेडियम में जैसे ही रावण, कुंभकर्ण, मेघनाथ और अहिरावण के पुतले खड़े किए जाते हैं, एक हैरान करने वाला विरोधाभास देखने को मिलता है। रावण को सिर्फ बुराई का प्रतीक नहीं, बल्कि एक प्रकांड विद्वान भी माना जाता है—यही कारण है कि पुतले में आग लगाने से ठीक पहले स्थानीय ग्रामीण और वनवासी समाज उसके अगाध ज्ञान को दूर से हाथ जोड़कर नमन करता है।

लेकिन, जैसे ही हनुमान का रूप धरे पात्र द्वारा लंका में आग लगाई जाती है और लपटें आसमान चूमने लगती हैं, उत्सव का क्लाइमैक्स अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाता है। पलक झपकते ही हज़ारों दर्शक और ग्रामीण पुतलों पर पत्थरों की बौछार शुरू कर देते हैं।
असत्य, अधर्म और अहंकार के खिलाफ आदिवासी समाज का दबा हुआ तीखा आक्रोश उन पत्थरों के ज़रिए बाहर निकलता है। इस बेकाबू और ऐतिहासिक जन-जुनून को थामने के लिए पुलिस और जिला प्रशासन को भी पसीने छूट जाते हैं।
जब समय पीछे लौटता है: राजसी रथयात्रा और अनोखी ‘वानर सेना’

जशपुर के इस सांस्कृतिक महाकुंभ का शंखनाद शारदीय नवरात्र के पहले दिन पक्की डाड़ी वृक्ष गंगा से पवित्र जल लाकर, काली मंदिर में 21 आचार्यों के महाअनुष्ठान के साथ होता है।
लेकिन इसका असली जादू विजयादशमी के सूरज ढलने से पहले परवान चढ़ता है, जब प्राचीन बालाजी मंदिर से एक शाही ठाठ-बाट वाली शोभायात्रा निकलती है।
भगवान बालाजी को एक विशिष्ट प्राचीन लकड़ी के रथ पर विराजमान किया जाता है, जिसके चारों ओर वानर सेना के रूप में नजर आते हैं।
आचार्यों, राजपुरोहितों और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की थाप के बीच जब यह काफिला नगाड़ों की गूंज के साथ रणजीता स्टेडियम पहुँचता है, तो ऐसा लगता है मानों पूरा शहर सदियों पुराने रियासतीय स्वर्णकाल में जी रहा हो।
माँ अपराजिता की छत्रछाया और रियासतकालीन ‘शस्त्र पूजन’
रणजीता स्टेडियम की पावन धरती पर रैनी डांड में रावण दहन से ठीक पहले एक बार फिर इतिहास सांस लेने लगता है। पौराणिक मान्यता है कि त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने भी रावण का वध करने से पहले माँ अपराजिता की आराधना की थी, जिससे उन्हें अजेय होने का वरदान मिला था।

यहाँ राजपरिवार के मुखिया (जैसे श्री रणविजय सिंह जूदेव) राजपरिवार के सदस्य राजपुरोहितों के वैदिक मंत्रोच्चार के बीच रियासतकालीन प्राचीन अस्त्र-शस्त्रों की पूजा संपन्न कराते हैं। मान्यता है कि माँ अपराजिता की साक्षी में होने वाले इस अनुष्ठान से पूरी प्रजा और राजा पर हमेशा विजयश्री का आशीर्वाद बना रहता है। इस पवित्र बेला में डोम जाति के कलाकारों के ढोल-नगाड़ों की थाप हवा में एक अलग ही सिहरन पैदा कर देती है।
जहाँ राजा और प्रजा का भेद मिटकर एक हो जाता है
जशपुर दशहरा की सबसे बड़ी और दिल जीत लेने वाली यूएसपी इसकी सर्वसमावेशी रूह है। रियासतकाल से लेकर आज तक, यहाँ राजसत्ता और जनजातीय समाज का आपसी सामंजस्य अटूट है। नवरात्र के पहले अनुष्ठान से लेकर पत्थरों की गूंज के बीच रावण दहन तक, समाज का हर वर्ग धर्म और जाति के तमाम कृत्रिम दायरों से ऊपर उठकर एक परिवार की तरह इस महाकुंभ में अपनी आहुति देता है।
यदि आपने इस बार जशपुर की इस अनूठी लोक-क्रांति को नहीं देखा, तो यकीनन आपने भारतीय संस्कृति के सबसे रॉ, असली और रोमांचक रंग को कभी छुआ ही नहीं!


