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नई दिल्ली: भारत सरकार ने असंगठित क्षेत्र के लाखों श्रमिकों के परिवारों के लिए खुशहाली के नए द्वार खोल दिए हैं। श्रम और रोजगार मंत्रालय ने एक ऐतिहासिक नीतिगत सुधार करते हुए सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के तहत छात्रवृत्ति नियमों को और अधिक मानवीय और समावेशी बना दिया है। अब बीड़ी, सिने और खदान श्रमिकों के होनहार बच्चों को पढ़ाई के लिए दोहरी आर्थिक मदद मिल सकेगी।
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नीतिगत बाधाएं खत्म, अब प्रतिभा का होगा सम्मान
अब तक के प्रावधानों में कुछ ऐसी तकनीकी जटिलताएं थीं, जिनकी वजह से श्रमिक परिवारों के बच्चों को अक्सर ‘कल्याणकारी सहायता’ और ‘योग्यता आधारित छात्रवृत्ति’ में से किसी एक को चुनना पड़ता था। मंत्रालय के इस नए सुधार ने उस भेदभाव को जड़ से मिटा दिया है। अब यदि कोई छात्र पढ़ाई में उत्कृष्ट प्रदर्शन करता है, तो वह मंत्रालय की विशेष वित्तीय सहायता के साथ-साथ केंद्र या राज्य सरकार की किसी भी ‘मेरिट स्कॉलरशिप’ का लाभ भी एक साथ उठा सकेगा।
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इन क्षेत्रों के परिवारों को मिलेगा सीधा संबल
यह बदलाव विशेष रूप से उन निर्बल परिवारों के लिए संजीवनी साबित होगा जो बीड़ी और सिने (फिल्म) उद्योग में कार्यरत हैं।लौह, मैंगनीज, क्रोम (IOMC), चूना पत्थर, डोलोमाइट और अभ्रक खदानों में पसीना बहा रहे हैं।यह योजना ‘नीड-बेस्ड’ यानी आवश्यकता पर आधारित है, जिसका उद्देश्य आर्थिक तंगी के कारण बच्चों की पढ़ाई बीच में छूटने (Drop-out) की समस्या को रोकना है।
मंत्रालय के इस प्रगतिशील कदम से प्रतिवर्ष लगभग एक लाख से अधिक अतिरिक्त छात्रों को लाभ मिलने की उम्मीद है। यह केवल एक वित्तीय सहायता नहीं है, बल्कि उन बच्चों के लिए उच्च शिक्षा के रास्ते आसान बनाने की एक ठोस कोशिश है, जो संसाधनों के अभाव में अपनी शैक्षणिक आकांक्षाओं को दबा देते थे।
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यह सुधार इस बात का प्रमाण है कि सरकार असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को केवल ‘मजदूर’ के रूप में नहीं, बल्कि एक सुरक्षित भविष्य के हकदार ‘नागरिक’ के रूप में देख रही है। सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 की मूल भावना को लागू करते हुए, यह पहल शिक्षा के माध्यम से सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण को सुनिश्चित करती है।यह पहल संदेश देती है कि मजदूर का बच्चा अब सिर्फ मजदूर बनने के लिए मजबूर नहीं होगा। वित्तीय सहायता और योग्यता के इस अनूठे संगम से उनकी आजीविका की संभावनाएं बेहतर होंगी और वे देश की मुख्यधारा में मजबूती से खड़े हो सकेंगे।

