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अवतरण दिवस पर विशेष भावांजलि

भारतीय आध्यात्मिक इतिहास साक्षी है कि समय-समय पर राजमहलों की विलासिता को त्यागकर ऋषित्व को अपनाने वाली महान आत्माओं ने ही समाज को नई दिशा दी है।

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जिस गौरवशाली परमार वंश ने कभी चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के पुरुषार्थ और महाराज भर्तृहरि के चरम वैराग्य को जन्म दिया, उसी अटूट विरासत की आध्यात्मिक लौ को आधुनिक युग में प्रज्वलित करने वाली दिव्य विभूति का नाम है— अवधूत गुरुपद संभव राम।

15 मार्च 1961 को इंदौर की ऐतिहासिक धरा पर एक तेजस्वी बालक का आगमन हुआ। नरसिंहगढ़ रियासत के महाराजा भानुप्रकाश सिंह और महारानी लक्ष्मी कुमारी के पुत्र राजकुमार यशोवर्धन सिंह का बचपन स्वर्ण आभा और राजसी मर्यादाओं के बीच बीता।

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इंदौर के प्रतिष्ठित डेली कॉलेज और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) जैसे संस्थानों से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद, राजकुमार के भीतर एक अनजानी आध्यात्मिक तड़प निरंतर बनी रही। पांच भाइयों के भरे-पूरे परिवार और ऐश्वर्य के तमाम साधनों के बीच भी उनकी आत्मा उस शाश्वत सत्य की खोज में व्याकुल थी, जो भौतिक सीमाओं से परे है।

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वर्ष 1982 के अर्धकुंभ ने उनके जीवन की धारा को एक नया और चिरस्थायी मोड़ दिया। जब राजकुमार यशोवर्धन अघोरेश्वर भगवान राम के शिविर में पहुँचे, तो गुरु की पारखी दृष्टि ने उस युवा चेहरे के पीछे छिपे महान संन्यासी को तत्क्षण पहचान लिया। वह उन्नत ललाट और शांत व्यक्तित्व स्पष्ट कर रहा था कि यह किशोर किसी सांसारिक रियासत का वारिस मात्र नहीं, बल्कि करोड़ों हृदयों में भक्ति की ज्योति जलाने वाला युग-पुरुष है।

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काशी के पावन तट पर अघोरेश्वर ने उन्हें ‘गुरुपद संभव राम’ का नया नाम दिया। यहीं से राजसी परिधानों का त्याग हुआ और वैराग्य का वह अनंत सफर शुरू हुआ, जिसने राजकुमार को जन-जन का ‘संभव बाबा’ बना दिया।

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अघोरेश्वर के अत्यंत प्रिय शिष्य के रूप में उन्होंने कठोर तपस्या और सेवा के कठिन मार्ग को चुना। उनकी साधना केवल व्यक्तिगत मोक्ष तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने जशपुर स्थित सोगड़ा आश्रम को लोक-कल्याण की एक जीवंत प्रयोगशाला बना दिया।

उन्होंने जशपुर की विशिष्ट जलवायु को परखते हुए वहां चाय और कॉफी की खेती का अभिनव प्रयोग किया। आश्रम में प्रोसेसिंग यूनिट की स्थापना कर वहां की ‘ग्रीन टी’ को एक वैश्विक पहचान दिलाई। उनकी इसी दूरदर्शिता का परिणाम है कि आज छत्तीसगढ़ सरकार ने राज्य में ‘टी-कॉफी बोर्ड’ के गठन जैसा महत्वपूर्ण निर्णय लिया है।

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पूज्य संभव बाबा का जीवन दर्शन अध्यात्म को धरातल की समस्याओं से जोड़ने का एक अनुपम उदाहरण है। उन्होंने वनवासी अंचलों में ‘इको-चूल्हा अभियान’ चलाकर न केवल निर्धन परिवारों को जानलेवा धुएँ से मुक्ति दिलाई, बल्कि वनों के संरक्षण का भी एक बड़ा संदेश दिया। राजमहल के समस्त सुखों को तिलांजलि देकर उन्होंने अपना पूरा जीवन आदिवासियों और पिछड़ों के उत्थान में समर्पित कर दिया।

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पूज्य गुरुपद संभव राम जी का व्यक्तित्व हमें यह सिखाता है कि वास्तविक त्याग संसार से भागना नहीं, बल्कि स्वयं को मानवता की सेवा में पूर्णतः गला देना है। वे आधुनिक युग के प्रतिरूप हैं महाराज भर्तृहरि के, जिन्होंने प्रमाणित किया कि राजसी सिंहासन से कहीं अधिक ऊंचा और सम्मानजनक स्थान गुरु के चरणों और दीन-दुखियों की सेवा में होता है।

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आज देश के शीर्ष राजनेता, प्रशासक और उद्योगपति भी उनके सरल, सहज और ओजस्वी व्यक्तित्व से प्रेरणा लेने सोगड़ा पहुँचते हैं।

अघोर पथ के इस देदीप्यमान नक्षत्र, अघोरेश्वर के अनन्य उपासक पूज्य बाबा के अवतरण दिवस पर संपूर्ण मानवता उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन करती है।

“हवाओं के रुख मोड़ने का हुनर जानते थे वो, जशपुर की आन और जनता की शान थे वो। जंग चाहे सियासत की हो या धर्म की ‘समीर’, मौत से भी न डरे, ऐसे ‘युद्धवीर’ थे वो!”

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